कृष्ण कुमार सैनी, चंडीगढ़| दो दशक से ज्यादा पुराने एक मामले में अदालत का फैसला आते ही कानूनी गलियारों में चर्चा तेज हो गई। जिस महिला को एक गंभीर आपराधिक साजिश का हिस्सा मानते हुए दोषी ठहराया गया था, अब उसी मामले में हाईकोर्ट ने बड़ा मोड़ ला दिया है। फैसले में अदालत ने साफ कहा कि केवल शक के आधार पर किसी को अपराधी नहीं ठहराया जा सकता, चाहे मामला कितना भी गंभीर क्यों न हो।

यह मामला ऐसा था जिसने शुरुआत से ही कई सवाल खड़े किए। आरोप था कि एक महिला ने पीड़िता को एक कमरे तक पहुंचाया, जिसके बाद वहां दुष्कर्म की घटना हुई। इसी आधार पर महिला को कथित साजिश और सहयोग का हिस्सा मान लिया गया था। लेकिन 24 साल बाद अदालत ने रिकॉर्ड खंगाले तो कहानी में कई कानूनी खामियां सामने आईं।

दरअसल Punjab and Haryana High Court ने 24 साल पुराने दुष्कर्म मामले में आपराधिक साजिश के लिए दोषी ठहराई गई महिला को बरी कर दिया है। न्यायमूर्ति Rupinderjit Chahal ने कहा कि “जितना घिनौना अपराध, उतना ऊंचा सबूत का मानदंड” होना चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि अपराध चाहे कितना भी गंभीर क्यों न हो, संदेह कानूनी सबूत की जगह नहीं ले सकता।

मामले में अभियोजन पक्ष का आरोप था कि महिला पीड़िता को कमरे तक लेकर गई थी और अंदर जाकर देखने के लिए कहा था, जहां सह-आरोपी ने कथित तौर पर चाकू दिखाकर दुष्कर्म किया। हालांकि अदालत ने कहा कि केवल इतना तथ्य यह साबित नहीं करता कि महिला को किसी आपराधिक साजिश की जानकारी थी या उसने जानबूझकर घटना में सहयोग किया।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि घटना के समय महिला की मौजूदगी को लेकर स्पष्ट साक्ष्य नहीं थे। जिरह के दौरान खुद पीड़िता ने माना था कि उसे नहीं पता महिला कमरे के बाहर थी या जा चुकी थी। ऐसे में अदालत ने ट्रायल कोर्ट द्वारा 2004 में सुनाई गई सजा और दोष सिद्धि को रद्द करते हुए महिला को बरी कर दिया।