Mallika Mango Farming: राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले का एक युवा किसान आज बागवानी की नई पहचान बन गया है। Mallika Mango की खेती कर कन्हैयालाल धाकड़ ने साबित किया कि पारंपरिक खेती से अलग सोच भी बड़ी सफलता दिला सकती है। 2 बीघा जमीन से शुरू हुआ उनका सफर आज 300 आम के पेड़ों और 200 क्विंटल उत्पादन तक पहुंच चुका है।

निजी नौकरी छोड़ खेती में आजमाया नया रास्ता
चित्तौड़गढ़ जिले की निंबाहेड़ा तहसील के भैरूखेड़ा गांव निवासी कन्हैयालाल धाकड़ ने बीए और इलेक्ट्रिकल डिप्लोमा किया। इसके बाद उन्होंने करीब 4 साल तक निजी कंपनियों में नौकरी की।
हालांकि नौकरी में संतुष्टि नहीं मिली। इसलिए उन्होंने खेती में कुछ अलग करने का फैसला लिया। साल 2017 में 2 बीघा जमीन पर आम का बगीचा तैयार किया। आज उनके खेत में करीब 300 आम के पेड़ हैं।
क्यों चुना Mallika Mango?
कन्हैयालाल ने बताया कि उन्होंने इंटरनेट के माध्यम से अलग-अलग आम की किस्मों की जानकारी जुटाई। काफी अध्ययन के बाद उन्होंने आंध्र प्रदेश की Mallika Mango किस्म को चुना।
यह किस्म नीलम और दशहरी आम का संकर रूप है। इसकी सबसे बड़ी खासियत इसका बेहद मीठा स्वाद और रेशे-रहित गूदा है। यही कारण है कि इसकी मांग खाने के साथ-साथ अचार बनाने के लिए भी बनी रहती है।
5 साल में 200 क्विंटल तक पहुंचा उत्पादन
शुरुआती वर्षों में उत्पादन कम रहा। साल 2020 में उनके बगीचे से करीब 10 क्विंटल आम निकले। इसके बाद लगातार उत्पादन बढ़ता गया। वर्ष 2025 में यह 150 क्विंटल तक पहुंच गया। वहीं इस वर्ष उन्होंने करीब 200 क्विंटल आम का उत्पादन किया है।
300 से 800 ग्राम तक होता है एक आम का वजन
Mallika Mango का एक फल सामान्य तौर पर 300 ग्राम से 800 ग्राम तक का होता है। इसका आकार बड़ा और स्वाद बेहद मीठा होता है। यही वजह है कि बाजार में इसकी अच्छी कीमत मिलती है।
देर से पकने वाली किस्म है Mallika Mango
इस किस्म की एक बड़ी विशेषता यह है कि यह अन्य आमों की तुलना में देर से पकती है। इसका सीजन जुलाई के अंत से अगस्त तक चलता है।
नतीजतन, जब दूसरी किस्मों के आम बाजार से लगभग खत्म हो जाते हैं, तब Mallika Mango की मांग बनी रहती है। इससे किसानों को बेहतर दाम और अधिक मुनाफा मिलता है।
करीब 1 लाख रुपये से शुरू हुई थी बागवानी
शुरुआत में कन्हैयालाल ने अपने आम स्थानीय बाजार में बेचे। अब उनके आम प्रतापगढ़, नीमच, उज्जैन और उदयपुर तक भेजे जा रहे हैं। बढ़ती मांग के कारण उनकी पहचान एक प्रगतिशील किसान के रूप में बनी है। उन्होंने बताया कि आम के पौधे मंगाने और बगीचा तैयार करने में शुरुआती दौर में लगभग 1 लाख रुपये खर्च हुए थे।
कन्हैयालाल बताते हैं कि इस सफर में उनके पिता मोहनलाल धाकड़ और पूरे परिवार की मेहनत सबसे बड़ी ताकत रही। आज उनके खेत को देखने और जानकारी लेने के लिए आसपास के क्षेत्रों से किसान पहुंचते हैं।
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