भिवानी के बहुचर्चित मनीषा मौत मामले में सोमवार को लघु सचिवालय के बाहर प्रस्तावित अनशन को पुलिस प्रशासन ने रोक दिया। कांग्रेस और सामाजिक संगठनों ने पुलिस की इस कार्रवाई को दमनकारी बताया है।
अजय सैनी, भिवानी। मनीषा मौत मामले में सोमवार को उस समय एक नया मोड़ आ गया, जब स्थानीय पुलिस ने धरना देने की कोशिश कर रहे लोगों को मौके से हटा दिया। पुलिस प्रशासन का साफ कहना था कि बिना किसी पूर्व अनुमति के धरना देना नियमों का पूरी तरह से उल्लंघन है। इस बहुचर्चित मामले में मृतका मनीषा के पिता संजय द्वारा तय कार्यक्रम के अनुसार आज भिवानी लघु सचिवालय के समक्ष अनशन किया जाना था, लेकिन उन्हें रास्ते में गांव कुडल के पास ही भारी पुलिस बल ने रोक लिया। इधर धरने के समर्थन में पहुंचे सामाजिक संगठन और कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को भी पुलिस ने लघु सचिवालय के सामने से जबरन हटा दिया।

पुलिस प्रशासन की कार्रवाई और विपक्ष का विरोध
इस पुलिसिया कार्रवाई पर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने राज्य सरकार की कड़ी निंदा की और इसे लोकतंत्र की सरेआम हत्या करार दिया। कांग्रेसी नेताओं ने कहा कि न्याय के लिए लोकतंत्र में शांतिपूर्ण तरीके से आवाज उठाना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है, लेकिन प्रशासन का इस प्रकार का दमनकारी रवैया सीधे तौर पर आम जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन है। इस संवेदनशील मौके पर कांग्रेस के शहरी जिला अध्यक्ष प्रदीप गुलिया ने बताया कि मनीषा हत्याकांड करीब 10 महीने पहले हुआ था, जिसे लेकर क्षेत्र में लगातार धरने और प्रदर्शन जारी हैं। इस आंदोलन में हमारे साथी कॉमरेड और सभी राजनीतिक पार्टियों के लोग शुरू से शामिल रहे हैं।
बेटी को न्याय दिलाने के लिए संघर्ष जारी
प्रदीप गुलिया ने बताया कि पिछली महापंचायत में सर्वसम्मति से यह बड़ा फैसला हुआ था कि 29 तारीख को लघु सचिवालय के बाहर मनीषा के पिता संजय आमरण अनशन पर बैठेंगे और हम सभी साथी उनका समर्थन करेंगे। मगर आज जब वे यहां आने के लिए निकले, तो पुलिस ने उन्हें रास्ते में ही रोक लिया। जब हमारे साथी यहां पहुंचे, तो उन्हें भी लघु सचिवालय के सामने धरने पर बैठने नहीं दिया गया। वक्ताओं ने गंभीर आरोप लगाया कि सरकार इस बेटी को न्याय नहीं देना चाहती है और किसी को बचाने का प्रयास कर रही है, वरना शांतिपूर्वक प्रदर्शन करने से प्रशासन को कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए थी।

