पटना। बिहार पुलिस की कार्यप्रणाली और सुरक्षा व्यवस्था में आधुनिक हथियारों का एक विशेष स्थान है। अक्सर सड़कों या वीआईपी मूवमेंट के दौरान खाकी वर्दीधारी जवानों को अत्याधुनिक हथियारों से लैस देखा जाता है, जिसे देखकर आम लोगों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या राज्य के हर पुलिसकर्मी को ऐसे खतरनाक हथियार दिए जाते हैं? इसका स्पष्ट उत्तर है नहीं। बिहार पुलिस में AK-47 जैसे आधुनिक और घातक हथियारों के आवंटन और उनके उपयोग को लेकर बेहद कड़े कानूनी प्रावधान और प्रशासनिक प्रोटोकॉल तय किए गए हैं।
किसे और किन यूनिट्स को मिलती है AK-47?
राज्य पुलिस बल में AK-47 राइफल हर आम सिपाही या थाने के पुलिसकर्मी को नहीं सौंपी जाती है। इन अत्याधुनिक हथियारों को केवल चुनिंदा और विशेष रूप से प्रशिक्षित सुरक्षा इकाइयों को ही मुहैया कराया जाता है।
- मुख्यमंत्री सुरक्षा (SSG): बिहार के मुख्यमंत्री की व्यक्तिगत और सुरक्षा घेरे की जिम्मेदारी संभालने वाली ‘स्पेशल सिक्योरिटी ग्रुप’ के कमांडो इसके मुख्य उपयोगकताओं में शामिल हैं।
- विशेष कार्य बल (STF): अपराधियों और गैंगस्टर्स के खिलाफ खुफिया व कड़े अभियान चलाने वाली एसटीएफ इकाई के पास ये हथियार होते हैं।
- विशेष जांच दल (SIT) और एसओजी: गंभीर मामलों की तहकीकात करने वाली एसआईटी और विशेष अभियान ग्रुप (SOG) को भी जरूरत के अनुसार यह हथियार दिए जाते हैं।
- नक्सल प्रभावित क्षेत्र: राज्य के उन संवेदनशील और दूरदराज के इलाकों में तैनात बल को ये राइफलें मिलती हैं, जहां भारी नक्सली या आतंकवादी हमले का खतरा लगातार बना रहता है।
हिंसक प्रदर्शनों में भी आम नहीं है AK-47 का प्रयोग
बिहार पुलिस की जिन विशिष्ट इकाइयों को ये हथियार आवंटित किए जाते हैं, वे भी सामान्य परिस्थितियों या रोजमर्रा की कानून-व्यवस्था बनाए रखने के काम में इनका इस्तेमाल बिल्कुल नहीं कर सकतीं। यदि कोई विरोध-प्रदर्शन या आंदोलन उग्र रूप भी ले ले, तब भी पुलिस बल के लिए बल प्रयोग हेतु निर्धारित कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करना शत-प्रतिशत अनिवार्य होता है।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और पुलिस सेवा के स्थापित नियमों के मुताबिक, किसी भी प्रकार के बल या हथियार के प्रयोग से पहले पुलिस को भीड़ को समझाने, बुझाने और शांतिपूर्ण तरीके से तितर-बितर करने का पूरा अवसर देना होता है। यदि इसके बाद भी हालात नियंत्रण में न आएं, तो पुलिस प्रशासन को क्रमिक चरणों का पालन करना पड़ता है।
गोली चलाना हमेशा होता है अंतिम विकल्प
कानून के शासन के तहत किसी भी स्थिति में गोली चलाना या घातक हथियारों का इस्तेमाल करना पुलिस बल के लिए हमेशा से अंतिम विकल्प माना गया है। कानून स्पष्ट निर्देश देता है कि जब तक आम नागरिकों के जान-माल को भारी नुकसान या क्षति पहुंचने की आसन्न आशंका न हो, अथवा पुलिसकर्मियों के अपने हथियार या कैंप के छीने जाने जैसी बेहद खतरनाक स्थिति पैदा न हो जाए, तब तक फायरिंग का उपयोग नहीं किया जा सकता।
इन सभी प्रक्रियाओं के संचालन के लिए एक निश्चित मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) बनाई गई है। चाहे पुलिसकर्मी एके-47 से जवाबी कार्रवाई करें या फिर अपनी सामान्य सर्विस रिवॉल्वर और रेगुलर राइफल से, सभी परिस्थितियों में सुरक्षा बलों पर कानूनी और प्रक्रियात्मक नियम एक समान रूप से लागू होते हैं।


