नारनौल के दोस्तपुर गांव में शहीद खुशीराम की बुजुर्ग वीरांगना पर हमला करने वाले 4 दोषियों को सेशन कोर्ट ने 10-10 साल की सजा सुनाई है। कोर्ट ने सभी दोषियों पर 80-80 हजार रुपये का जुर्माना लगाकर पीड़ित बुजुर्ग महिला को देने के आदेश दिए हैं।
गुलशन कुमार, महेंद्रगढ़। देश की सीमाओं की सुरक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान देने वाले शहीद के परिवार की सुरक्षा और सम्मान को ठेस पहुंचाने वाले अपराधियों के खिलाफ महेंद्रगढ़ जिला अदालत ने एक नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है। नांगल चौधरी उपमंडल के दोस्तपुर गांव में पिछले साल शहीद खुशीराम की बुजुर्ग वीरांगना के साथ हुई दरिंदगी और मारपीट के मामले में सेशन कोर्ट ने चारों मुख्य आरोपियों को दोषी करार देते हुए 10-10 साल की कड़ी कैद की सजा मुकर्रर की है।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (एएसजे) नितिन राज की अदालत ने सोमवार दोपहर यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अदालत ने साफ कर दिया कि कानून की नजर में सामाजिक मर्यादा और मानवीय संवेदनाओं को कुचलने वालों के लिए कोई रहम नहीं है। कोर्ट ने सभी दोषियों पर 80-80 हजार रुपये का जुर्माना लगाते हुए यह पूरी राशि आर्थिक और मानसिक रूप से पीड़ित बुजुर्ग वीरांगना को सौंपने के आदेश दिए हैं।
दीवार फांदकर घुसे थे दरिंदे
मामले की भयावहता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 12 अप्रैल 2025 की दोपहर जब पूरा गांव सन्नाटे में था, तब रोहित कुमार, विशाल कुमार, सुरेंद्र सिंह और राहुल कुमार हथियारों से लैस होकर शहीद के घर की दीवार लांघकर अंदर दाखिल हुए थे। वहां आराम कर रही बुजुर्ग महिला पर इन बदमाशों ने लाठी-डंडों से बर्बर हमला कर दिया और हथियार लहराते हुए पूरे मोहल्ले में खौफ पैदा कर दिया।
शुरुआती दौर में पुलिस ने औपचारिकता निभाते हुए आरोपियों को गिरफ्तार किया, जिसके बाद वे आसानी से जमानत पर बाहर आ गए। बाहर आते ही इनकी आपराधिक हिम्मत इतनी बढ़ गई कि मुख्य आरोपी रोहित कुमार ने एक अन्य हत्याकांड को अंजाम दे डाला और फिलहाल वह जेल में बंद है। पीड़ित पक्ष के वकील विपिन कुमार बड़कोदा ने अदालत के समक्ष इन आरोपियों के पुराने आपराधिक रिकॉर्ड और पुख्ता सबूत पेश किए, जिसके आगे बचाव पक्ष की तमाम दलीलें ढह गईं।
जनाक्रोश के बाद जागी पुलिस
इस पूरे मामले में पुलिस प्रशासन की कार्यशैली पर भी गहरे सवाल उठे थे। पीड़ित वीरांगना के सैनिक पुत्र कृष्ण कुमार ने वारदात से महज पांच दिन पहले यानी 7 अप्रैल को ही जिला पुलिस अधीक्षक (एसपी) से मिलकर घर पर हमले की आशंका जताते हुए सुरक्षा की गुहार लगाई थी। इसके बावजूद पुलिसिया तंत्र सोया रहा और 12 अप्रैल को वारदात हो गई।
घटना के बाद भी जब पुलिस ने नामजद आरोपियों को हाथ लगाने में ढील बरती, तो 14 अप्रैल को सर्वसमाज की महापंचायत बुलाई गई। ग्रामीणों के भारी आक्रोश और एसपी कार्यालय पर प्रदर्शन के बाद ही पुलिस बैकफुट पर आई और आरोपियों की धरपकड़ की गई थी।
15 महीने बाद आया फैसला
फास्ट ट्रैक मोड में चली कानूनी प्रक्रिया के तहत करीब 15 महीने के भीतर न्याय की चौखट से आए इस फैसले पर पीड़ित परिवार और ग्रामीणों ने राहत की सांस ली है। बुजुर्ग वीरांगना ने फैसले पर संतोष व्यक्त करते हुए कहा कि भले ही पुलिस ने शुरू में लापरवाही की, लेकिन अदालत में एडवोकेट विपिन यादव की मजबूत पैरवी और अदालत के कड़े रुख से अपराधियों के हौसले पस्त होंगे और किसी दूसरे शहीद के घर पर आंख उठाने की हिम्मत कोई नहीं करेगा।
सीसीटीवी फुटेज में कैद मारपीट की लाइव तस्वीरों ने इस केस में अभियोजन पक्ष के लिए सबसे अचूक हथियार का काम किया, जिसे माननीय न्यायाधीश ने सजा का मुख्य आधार बनाया।


