अभय मिश्रा, मऊगंज। मध्य प्रदेश के नवनिर्मित जिले मऊगंज से एक हृदयविदारक तस्वीर सामने आई है। जहां एक तरफ सरकार महिला सशक्तिकरण और आदिवासी कल्याण के बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं दूसरी तरफ मऊगंज नगर में प्रशासन के बुलडोजर ने 7 आदिवासी परिवारों के सिर से छत छीन ली है। हैरानी की बात यह है कि जिन घरों को अतिक्रमण बताकर ढहाया गया, उनके पास पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के समय के भू-अधिकार पट्टे थे और उन्हीं पट्टों के आधार पर उन्हें प्रधानमंत्री आवास का लाभ भी मिला था। आज वो पक्के मकान मलबे के ढेर में तब्दील हो चुके हैं। इस भीषण गर्मी और आंधी-तूफान के बीच अब ये परिवार खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हैं।
मऊगंज के वार्ड क्रमांक 11 में आज सुबह सन्नाटा उस वक्त चीखों में बदल गया जब भारी पुलिस बल और राजस्व अमले के साथ प्रशासन का बुलडोजर आदिवासियों की बस्ती में दाखिल हुआ। देखते ही देखते प्रशासनिक अमले ने मकानों को जमींदोज करना शुरू कर दिया। चीखती-चिल्लाती महिलाएं और बुजुर्ग अधिकारी के सामने गिड़गिड़ाते रहे, अपने हाथ में ‘भू-अधिकार पट्टा’ दिखाते रहे, लेकिन प्रशासन की मशीनों के शोर में गरीबों की आवाज दबकर रह गई।
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पीड़ितों का छलका दर्द
पीड़ित परिवारों का आरोप है कि उन्हें संभलने तक का मौका नहीं दिया गया। घर के भीतर रखा अनाज, खाने-पीने के बर्तन और गृहस्थी का सारा सामान मलबे के नीचे दब गया। स्थिति यह है कि इस तपती धूप में इन परिवारों के पास अब दाने-दाने के लिए मोहताज होने की नौबत आ गई है। बुजुर्ग महिलाएं पूछ रही हैं कि आखिर जब सरकार ने खुद पट्टा दिया और खुद ही प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर बनवाया, तो आज उसी सरकारी तंत्र ने इसे अवैध कैसे करार दे दिया?
खुशियों के आंगन को प्रशासन ने उजाड़ दिया- पूर्व विधायक
घटना की सूचना मिलते ही कांग्रेस के पूर्व विधायक सुखेंद्र सिंह बन्ना मौके पर पहुंचे। उनके पहुंचने से पहले ही प्रशासन वहां से निकल चुका था। बन्ना ने पीड़ितों की व्यथा सुनी और तत्काल आर्थिक मदद मुहैया कराई। उन्होंने सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि बीजेपी सरकार पिछले शासनकाल में दिए गए पट्टों को मानने से इनकार कर रही है। सबसे दुखद पहलू यह है कि इन परिवारों में अगले कुछ दिनों में 6 से 7 शादियां होनी तय हैं, लेकिन खुशियों के आंगन को प्रशासन ने उजाड़ दिया।
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राजस्व अमला मौन
इधर, राजस्व अमले ने इस पूरी कार्रवाई पर चुप्पी साध ली है। सवाल यह उठता है कि क्या इन परिवारों को उजाड़ने से पहले उनके पुनर्वास की कोई व्यवस्था की गई थी? क्या बेघर हुए इन 20 से अधिक लोगों की सुध लेने वाला कोई है? फिलहाल पूर्व विधायक ने सोमवार को प्रशासन से मिलकर आर-पार की लड़ाई का ऐलान किया है। “अब देखना यह होगा कि न्याय की गुहार लगा रहे इन आदिवासी परिवारों को दोबारा छत नसीब होती है या इस शोर के बीच इन गरीबों की सिसकियां अनसुनी रह जाएंगी।


