लखनऊ. बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने आरक्षण के मुद्दे पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत के बयान को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी है. मायावती ने कहा कि आरक्षण देश के बहुजन समाज, खासकर अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए केवल नौकरी या शिक्षा का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन, आर्थिक मुक्ति और आत्मसम्मान से जुड़ा महत्वपूर्ण अधिकार है.
मायावती ने कहा कि सदियों से जातिगत भेदभाव, शोषण और अत्याचार झेलने वाले समाजों के लिए आरक्षण बेहद जरूरी है. उन्होंने आरक्षण में क्रीमी लेयर की व्यवस्था को लेकर भी आपत्ति जताई और इसे बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के संविधान की मूल भावना के विपरीत बताया.
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‘RSS आरक्षण के मुद्दे पर राजनीति बंद करे’
बसपा प्रमुख मायावती ने RSS से अपील करते हुए कहा कि संगठन को बाबा साहेब आंबेडकर के मानवतावादी और कल्याणकारी संविधान का सम्मान करना चाहिए. उन्होंने कहा कि आरक्षण जैसे संवेदनशील विषय पर राजनीति करने से बचना चाहिए. मायावती ने कहा कि संविधान का उद्देश्य देश में समतामूलक समाज की स्थापना करना है. ऐसे में आरक्षण व्यवस्था को कमजोर करने या उसमें बदलाव की वकालत करने से सामाजिक न्याय के लक्ष्य को नुकसान पहुंच सकता है.
मोहन भागवत के बयान पर मायावती का पलटवार
दरअसल, मायावती ने RSS प्रमुख मोहन भागवत के उस बयान पर प्रतिक्रिया दी है, जिसमें उन्होंने आरक्षण के राजनीतिकरण की बात कही थी. भागवत ने कहा था कि आरक्षण के लाभार्थियों को स्वेच्छा से इसके लाभ छोड़ने पर विचार करना चाहिए. मायावती ने इस बयान को लेकर कहा कि आरक्षण को केवल आर्थिक नजरिए से नहीं देखा जा सकता. उन्होंने कहा कि जातिगत भेदभाव का असर समाज में आज भी दिखाई देता है और आरक्षण वंचित वर्गों को बराबरी का अवसर देने का संवैधानिक माध्यम है.
‘जातिवाद का असर आज भी जारी’
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि आरक्षण का उद्देश्य केवल आर्थिक पिछड़ापन दूर करना नहीं है, बल्कि सदियों से चली आ रही सामाजिक असमानता को खत्म करना भी है. उन्होंने कहा कि एससी, एसटी और ओबीसी समाज ने लंबे समय तक सामाजिक उपेक्षा और भेदभाव का सामना किया है. ऐसे में आरक्षण को खत्म करने या सीमित करने की कोई भी कोशिश संविधान की मूल भावना के खिलाफ होगी.
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सरकार की कानूनी पैरवी पर भी उठाए सवाल
मायावती ने केंद्र सरकार की भूमिका पर भी सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि देश की सभी सरकारें सामाजिक वास्तविकताओं से परिचित हैं. अगर केंद्र सरकार उचित तर्कों और प्रभावी कानूनी पैरवी के जरिए एससी और एसटी वर्ग को क्रीमी लेयर के दायरे से बाहर रखने के पक्ष में अदालत को संतुष्ट करती है तो यह संवैधानिक दृष्टि से उचित कदम होगा.
उन्होंने आरोप लगाया कि कई बार सरकारों की कमजोर कानूनी पैरवी के कारण सामाजिक न्याय से जुड़े मामलों में अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाते. आरक्षण को लेकर मायावती के इस बयान के बाद एक बार फिर देश की राजनीति में सामाजिक न्याय और संवैधानिक अधिकारों को लेकर बहस तेज हो गई है.


