सोहराब आलम, मोतिहारी। शहर में बंद पड़ी चीनी मिल और उसकी बहुमूल्य जमीन को लेकर बिहार की सियासत एक बार फिर गरमा गई है। राज्य में इस मिल को दोबारा शुरू करने को लेकर राजनीतिक हलचल तेज है, लेकिन इस बीच जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने सरकार के सामने एक तीखा और बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। प्रशांत किशोर के इस बयान ने विकास के दावों के बीच जमीन खरीद-बिक्री के पुराने पन्नों को पलटने पर मजबूर कर दिया है, जिससे आने वाले दिनों में यह मुद्दा और अधिक तूल पकड़ सकता है।
चीनी मिल की जमीन पर गंभीर सवाल
प्रशांत किशोर ने मोतिहारी चीनी मिल की जमीन के सौदों को लेकर सीधा हमला बोला है। उनका आरोप है कि मिल बंद होने के बाद इसकी विशाल और कीमती जमीन के एक बड़े हिस्से की खरीद-बिक्री में बड़े पैमाने पर हेरफेर हुई है। उन्होंने मांग की है कि इस पूरे मामले की गहराई से जांच होनी चाहिए। प्रशांत किशोर के अनुसार, इस जमीन के खेल में केवल आम लोग या छोटे व्यापारी नहीं, बल्कि सत्ताधारी दल यानी भाजपा से जुड़े कई वर्तमान और पूर्व विधायक, सांसद, मंत्री और बड़े पदाधिकारी संलिप्त हो सकते हैं।
सरकार की पहल बनाम निष्पक्ष जांच की मांग
एक तरफ जहां प्रशासन और सरकार बंद पड़ी मिल को दोबारा चालू करने की दिशा में सकारात्मक प्रयास कर रही है, वहीं दूसरी तरफ प्रशांत किशोर का यह तर्क है कि किसी भी नए काम की शुरुआत से पहले पुराने भ्रष्टाचार की सफाई जरूरी है। उनका कहना है कि अगर सरकार वास्तव में जनता का भला चाहती है और विकास के प्रति ईमानदार है, तो उसे सबसे पहले मिल की जमीन के हर एक सौदे की सार्वजनिक जांच करवानी चाहिए। यदि जांच में कोई भी दोषी पाया जाता है, तो उस पर सख्त कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए। बिना पुरानी गड़बड़ियों को ठीक किए जनता से यह उम्मीद करना बेमानी होगा कि वह सरकार के नए वादों पर आंख मूंदकर भरोसा कर लेगी।
सियासी गलियारों में सुगबुगाहट और आगे की राह
प्रशांत किशोर के इन तीखे तेवरों और गंभीर आरोपों के बाद मोतिहारी का यह चीनी मिल मामला केवल एक औद्योगिक मुद्दा न रहकर पूरी तरह से राजनीतिक रंग ले चुका है। स्थानीय स्तर पर अब आम लोगों और विपक्षी दलों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या मिल वाकई दोबारा शुरू हो पाएगी या यह मामला सिर्फ बयानों की राजनीति बनकर रह जाएगा। क्या सरकार जमीन के पुराने और उलझे हुए मामलों की सुई घुमाने की हिम्मत जुटा पाएगी या नहीं, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। लेकिन इतना तय है कि मुख्यमंत्री की इस पहल और प्रशांत किशोर के तीखे हमलों के बीच यह विवाद अब थमने वाला नहीं है, बल्कि बिहार की आगामी राजनीति का एक अहम केंद्र जरूर बन गया है।



