शब्बीर अहमद, भोपाल। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के बरकतउल्ला विश्वविद्यालय का नाम बदलने की तैयारी है। बुधवार को हुई कार्य परिषद की बैठक में एक अहम फैसला लिया गया है। विश्वविद्यालय का नाम वाग्देवी भोजपाल विश्वविद्यालय करने के अनुशंसा की गई है। अब नाम बदलने का प्रस्ताव राज्य सरकार को भेजा जाएगा। वहीं इसे लेकर विरोध भी शुरू हो गया है।

प्रस्ताव में दिए गए ये तर्क

बुधवार को कार्य परिषद की बैठक बुलाई गई थी। जिसमें विश्वविद्यालय का नाम वाग्देवी भोजपाल विश्वविद्यालय करने के अनुशंसा की गई। मीटिंग में यह तर्क दिया गया है कि राजा भोज का नाम प्रदेश की ऐतिहासिक और बौद्धिक विरासत का प्रतीक है। इसके आधार पर यूनिवर्सिटी को उनके नाम से जोड़ने की बात रखी गई। यह भी कहा गया कि मौलाना बरकतउल्ला भोपाल में पैदा हुए, यही पढ़ाई की लेकिन उनका ज्यादा समय विदेश में बीता था, बच्चों के लिए यह नाम गौरवशाली नहीं है।

प्रस्ताव में यह भी कहा गया कि भोपाल के इतिहास और इसकी पहचान में राजा भोज का योगदान अतुलनीय है। राजा भोज के जीवनकाल की एक बड़ी देन भोपाल का बड़ा तालाब है जो आज भी लाखों भोपाल निवासियों को पानी उपलब्ध करता है। भोपाल से मात्र 28 किलोमीटर दूर स्थित भोजपुर मंदिर राजा भोज की धार्मिक और वास्तुकला संबंधी दूरदर्शिता का साक्षात प्रमाण है। राजा भोज की लगभग अस्सी ग्रंथ लिखे गए जिनमें से 27 आज भी उपलब्ध है। राजा भोज ने केवल स्वयं ग्रंथ नहीं लिखे, बल्कि अपनी राजधानी धारा (धार) को ज्ञान का सबसे बड़ा केंद्र बनाया। उन्होंने वहाँ ‘भोजशाला’ (सरस्वती मंदिर) की स्थापना की, जो उस दौर का एक महान विश्वविद्यालय था। इतना ही नहीं अरबी और पर्शियन जैसे पारंपरिक विषयों को एक साथ लाकर ‘तुलनात्मक भाषा एवं संस्कृति विभाग’ के रूप में पुनर्गठित करने को लेकर भी चर्चा हुई।

नाम बदलने को लेकर विरोध शरू

वहीं बरकतउल्ला विश्वविद्यालय का नाम बदलने को लेकर विरोध भी शुरू हो गया है। ईसी की सदस्य डॉ. ताहिरा अब्बासी ने कहा कि यूनिवर्सिटी का मौजूदा नाम स्वतंत्रता सेनानी बरकतउल्लाह भोपाली की स्मृति से जुड़ा है, जिसे बदला जाना ठीक नहीं होगा। डॉ. ताहिरा अब्बासी ने सुझाव दिया कि अगर नया नाम देना ही है तो किसी नए विश्वविद्यालय को दिया जाए।

आगे क्या होगा ?

आपको बता दें कि किसी भी सरकारी विश्वविद्यालय का नाम बदलने के लिए कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। सबसे पहले विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद या एग्जीक्यूटिव काउंसिल में नाम बदनले को लेकर प्रस्ताव रखा जाता है। परिषद से मंजूरी मिलने के बाद राज्य के उच्च शिक्षा विभाग और फिर इसे सरकार के पास भेजा जाता है।

संबंधित कानून में संशोधन जरूरी

वहीं राज्य विधानसभा में संशोधन विधेयक पेश करना जरूरी है। विधेयक पारित होने और राज्यपाल की मंजूरी के बाद सरकार इसे राजपत्र में अधिसूचना जारी करती है। इसके बाद यूनिवर्सिटी का नया नाम आधिकारिक रूप से लागू होता है। फिर विश्वविद्यालय की वेबसाइट, प्रमाणपत्र, डिग्री, रिकॉर्ड और अन्य सरकारी दस्तावेजों में नया नाम अपडेट किया जाता है।

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