राकेश चतुर्वेदी, Bhopal. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने राज्य के हित में एक और ऐतिहासिक कामयाबी हासिल की है। लगभग तीन दशकों से लंबित नर्मदा एवं सरदार सरोवर परियोजना के पुनर्वास और दोबारा बसाहट व्यय विवाद का आखिरकार समाधान हो गया है। गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान और मध्य प्रदेश के बीच हुए इस समझौते से मध्य प्रदेश के खजाने पर आने वाला एक बहुत बड़ा आर्थिक बोझ टल गया है, जिससे सूबे को 1268 करोड़ रुपये की सीधी बचत हुई है।
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अटॉर्नी जनरल के फॉर्मूले से लग रहा था 1500 करोड़ रुपये का फटका, अब देंगे सिर्फ…
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इस ऐतिहासिक समझौते की कड़ियों को खोलते हुए बताया कि यह फैसला मध्य प्रदेश के लिए किसी बड़ी लॉटरी से कम नहीं है। दरअसल इस विवाद को सुलझाने के लिए अटॉर्नी जनरल की ओर से जो पुराना फॉर्मूला तय किया जा रहा था, उसके मुताबिक मध्य प्रदेश पर अकेले 1500 करोड़ रुपये की भारी-भरकम देनदारी बन रही थी।
सीएम मोहन यादव की मजबूत पैरवी और चारों राज्यों की सहमति के बाद हुए इस नए समझौते ने पूरा गेम बदल दिया। अब मध्य प्रदेश को गुजरात को 1500 करोड़ रुपये के बजाय सिर्फ 231.80 करोड़ रुपये ही देने होंगे। सर्वसम्मति से इस विवादित खर्चे में मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी को 31.98% से घटाकर सीधे 16.17% तय कर दिया गया है। इसी गणित के चलते राज्य के ₹1268 करोड़ रुपये सीधे तौर पर बच गए हैं।
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MP के इन शहरों की बुझेगी प्यास, 31 लाख हेक्टेयर में सिंचाई
यह समझौता सिर्फ पैसों की बचत तक सीमित नहीं है, बल्कि सरदार सरोवर परियोजना मध्य प्रदेश की लाइफलाइन साबित हो रही है:
किसानों को फायदा: इस परियोजना के जरिए मध्य प्रदेश की लगभग 31 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई की शानदार सुविधा मिल रही है, जिससे मालवा और निमाड़ समेत कई अंचलों के किसान समृद्ध हो रहे हैं।
बड़े शहरों को मिल रहा नर्मदा जल: परियोजना के जरिए प्रदेश के प्रमुख महानगरों और शहरों- जबलपुर, कटनी, देवास, उज्जैन, इंदौर और धार समेत कई इलाकों में पीने और उपयोग के लिए नर्मदा जल की निर्बाध आपूर्ति की जा रही है।
इंडस्ट्रियल हब को संजीवनी: शहरों के साथ-साथ एमपी के सबसे बड़े औद्योगिक क्षेत्रों जैसे पीथमपुर, देवास और विक्रम उद्योगपुरी को भी इसी परियोजना से भरपूर औद्योगिक जल मिल रहा है, जिससे उद्योगों का पहिया तेजी से घूम रहा है।
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