हरियाणा के हालिया नगर निकाय चुनावों ने मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के नेतृत्व पर मुहर लगा दी है, जिससे पार्टी के भीतर और बाहर उनके कद में बड़ी वृद्धि हुई है।

कृष्ण कुमार सैनी, चंडीगढ़। हरियाणा की राजनीति में कई बार चुनाव सिर्फ सीटों का हिसाब नहीं होते, बल्कि चेहरों की किस्मत भी तय करते हैं। इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ। बाहर से यह चुनाव नगर निकायों का था, लेकिन भीतर ही भीतर यह एक व्यक्ति की राजनीतिक स्वीकार्यता का टेस्ट बन चुका था। सवाल सिर्फ इतना नहीं था कि भाजपा कितनी सीटें जीतेगी, बल्कि असली सवाल यह था कि क्या मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी अपनी राजनीतिक पकड़ साबित कर पाएंगे या नहीं।

क्योंकि पिछले डेढ़ साल से हरियाणा की सत्ता के गलियारों में एक चर्चा लगातार तैर रही थी। चर्चा यह कि क्या नायब सैनी सिर्फ “संक्रमणकालीन मुख्यमंत्री” हैं? क्या वे लंबे समय तक कुर्सी संभाल पाएंगे? क्या पार्टी भविष्य में कोई नया चेहरा ला सकती है? और सबसे बड़ा सवाल… क्या वे खुद को एक स्वतंत्र राजनीतिक नेतृत्व के रूप में स्थापित कर पाएंगे?

इन सवालों का जवाब सिर्फ बयान नहीं दे सकते थे। जवाब चुनाव परिणामों से ही निकलना था। यही वजह रही कि इस बार के चुनाव सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया से कहीं ज्यादा “मुख्यमंत्री का इम्तिहान” बन गए।

मार्च 2024 का वह दिन हरियाणा की राजनीति में अचानक आया मोड़ था। जब मनोहर लाल खट्टर ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया और भाजपा ने बिना ज्यादा शोर किए नायब सिंह सैनी को हरियाणा की कमान सौंप दी। उस वक्त राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा हैरानी इसी बात को लेकर थी कि आखिर पार्टी ने इतना बड़ा दांव क्यों खेला।

उस समय विपक्ष ने तो सवाल उठाए ही, भाजपा के भीतर भी कई तरह की फुसफुसाहटें शुरू हो गई थीं। राजनीतिक विश्लेषकों ने कहा कि यह सिर्फ चुनाव तक का इंतजाम है। कुछ लोगों ने तो उन्हें “रबड़ स्टैम्प मुख्यमंत्री” तक कह दिया। आरोप यह भी लगा कि असली नियंत्रण कहीं और रहेगा और नायब सैनी सिर्फ औपचारिक चेहरा होंगे।

उस वक्त उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी अपनी पहचान बनाना। क्योंकि वे ऐसे नेता नहीं माने जाते थे जो आक्रामक राजनीति करते हों। उनका स्वभाव सीधा-सादा माना जाता रहा है। हरियाणा जैसी तेज और टकराव वाली राजनीति में कई लोगों को लगता था कि यह सीधापन उनके लिए कमजोरी बन सकता है।

फिर आया लोकसभा चुनाव। भाजपा को हरियाणा में उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं मिला। विपक्ष ने तुरंत इसे नायब सैनी के नेतृत्व से जोड़ दिया। राजनीतिक चर्चाओं में कहा जाने लगा कि यदि विधानसभा चुनाव में भाजपा वापसी करती भी है तो मुख्यमंत्री का चेहरा बदला जा सकता है।

लेकिन अक्टूबर 2024 में तस्वीर बदली।
भाजपा लगातार तीसरी बार हरियाणा की सत्ता में लौट आई। यह अपने आप में बड़ा राजनीतिक संदेश था। उससे भी बड़ा संदेश तब गया जब पार्टी ने चुनावी वादे के मुताबिक फिर से नायब सिंह सैनी को ही मुख्यमंत्री बनाया। यहीं से साफ हो गया कि पार्टी फिलहाल उन पर भरोसा बनाए रखना चाहती है।

हालांकि इसके बाद भी अटकलें खत्म नहीं हुईं।
कभी संगठन में बदलाव की चर्चा, कभी नए समीकरणों की बात, कभी दिल्ली दरबार की पसंद-नापसंद… हर कुछ महीनों में यह सवाल फिर उठ खड़ा होता कि क्या मुख्यमंत्री की कुर्सी पूरी तरह सुरक्षित है? यही कारण था कि नगर निकाय चुनाव सिर्फ स्थानीय निकायों का चुनाव नहीं रह गए थे। वे मुख्यमंत्री की राजनीतिक रिपोर्ट कार्ड बन चुके थे।

भाजपा के लिए भी यह चुनाव साधारण नहीं थे। क्योंकि विधानसभा चुनाव जीतने के बाद पहली बार जनता के बीच सरकार की वास्तविक लोकप्रियता मापी जानी थी। और इस बार सरकार का चेहरा मनोहर लाल खट्टर नहीं बल्कि नायब सिंह सैनी थे।

चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा नेताओं की भाषा पर ध्यान दिया जाए तो साफ दिखता था कि पार्टी पूरी तरह मुख्यमंत्री के चेहरे पर चुनाव लड़ रही थी। हर जीत सीधे तौर पर नायब सैनी की जीत मानी जानी थी और हर हार उनके नेतृत्व पर सवाल खड़े करने वाली थी।

राजनीतिक गलियारों में यह भी कहा जा रहा था कि यदि परिणाम कमजोर आते हैं तो दिल्ली नेतृत्व फिर नए समीकरण तलाश सकता है। यानी यह चुनाव सिर्फ निकायों का नहीं बल्कि “विश्वास परीक्षण” था। इसीलिए जब नतीजे आने शुरू हुए तो सबसे ज्यादा नजरें मुख्यमंत्री कार्यालय पर थीं। भाजपा का प्रदर्शन मजबूत दिखा और धीरे-धीरे यह साफ होने लगा कि पार्टी चुनावी परीक्षा में सफल मानी जाएगी। इसके साथ ही एक और संदेश निकला— नायब सैनी अब सिर्फ “समझौता उम्मीदवार” नहीं रहे।

राजनीति में सबसे बड़ी ताकत परिणाम होते हैं। और परिणाम यदि पक्ष में आ जाएं तो आलोचना का स्वर खुद धीमा पड़ने लगता है। इन चुनावों के बाद भाजपा के भीतर भी नायब सैनी की स्थिति मजबूत होती दिखाई दे रही है। क्योंकि अब उनके पास यह कहने का राजनीतिक आधार है कि उनके नेतृत्व में पार्टी ने चुनावी सफलता हासिल की है। यही वह चीज थी जिसकी उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत थी।

दरअसल हर मुख्यमंत्री का एक “व्यक्तिगत जनादेश” होता है। मनोहर लाल खट्टर के पास दस साल की प्रशासनिक छवि थी। लेकिन नायब सैनी अभी तक उस स्तर का स्वतंत्र जनादेश तैयार नहीं कर पाए थे। नगर निकाय चुनावों ने उन्हें वही शुरुआती राजनीतिक प्रमाणपत्र दिया है।यही वजह है कि अब भाजपा के भीतर उनके विरोध में खुलकर बोलना आसान नहीं रहेगा।

सबसे दिलचस्प बात यह रही कि चुनाव के बाद मुख्यमंत्री के चेहरे और बॉडी लैंग्वेज में भी आत्मविश्वास साफ दिखाई दिया। पहले जहां वे लगातार खुद को साबित करने की स्थिति में नजर आते थे, अब वे अधिक स्थिर और नियंत्रण में दिखाई दे रहे हैं। राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि कुर्सी सिर्फ हाईकमान नहीं बचाता, चुनाव बचाते हैं। जिस नेता के खाते में जीत जुड़ती जाती है, उसकी राजनीतिक उम्र भी बढ़ती जाती है। नायब सैनी के लिए यह जीत उसी दिशा में बड़ा कदम मानी जा रही है।

हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि अब उनके सामने कोई चुनौती नहीं बची। हरियाणा भाजपा की राजनीति हमेशा कई शक्ति केंद्रों के बीच घूमती रही है। यहां क्षेत्रीय, जातीय और संगठनात्मक समीकरण लगातार बदलते रहते हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री को हर मोर्चे पर संतुलन बनाकर चलना होगा। लेकिन फिलहाल की तस्वीर यही कह रही है कि उन्होंने सबसे मुश्किल शुरुआती परीक्षा पास कर ली है।

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यदि इन चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन कमजोर रहता तो मुख्यमंत्री की कार्यशैली, नेतृत्व क्षमता और राजनीतिक स्वीकार्यता पर बड़े सवाल उठते। विपक्ष इसे बड़ा मुद्दा बनाता और पार्टी के भीतर भी दबाव बढ़ सकता था। लेकिन जीत ने फिलहाल उन सभी संभावनाओं पर ब्रेक लगा दिया है।
अब भाजपा संगठन में भी यह संदेश गया है कि नायब सैनी चुनाव जिता सकते हैं। और भारतीय जनता पार्टी में किसी भी नेता की असली ताकत यही मानी जाती है।

दिलचस्प यह भी है कि नायब सैनी ने अपने कार्यकाल में खुद को ज्यादा विवादों से दूर रखा। वे आक्रामक बयानबाजी से बचते रहे और संगठन व सरकार के बीच संतुलन साधने की कोशिश करते दिखे। पहले इसे उनकी कमजोरी माना जा रहा था, लेकिन अब भाजपा के कुछ नेता इसी को उनकी ताकत बताने लगे हैं।
क्योंकि भाजपा नेतृत्व कई बार ऐसे चेहरे पसंद करता है जो संगठन के साथ तालमेल में चलें और अनावश्यक विवादों से दूर रहें।

यही कारण है कि अब यह चर्चा भी शुरू हो गई है कि यदि सब कुछ सामान्य रहा तो नायब सैनी 2029 तक मुख्यमंत्री बने रह सकते हैं। हालांकि राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता, लेकिन मौजूदा परिस्थितियां फिलहाल उनके पक्ष में दिखाई दे रही हैं। विपक्ष भी अब सीधे तौर पर उन्हें कमजोर मुख्यमंत्री बताने की रणनीति पर दोबारा सोच सकता है। क्योंकि चुनावी सफलता के बाद जनता के बीच उनका राजनीतिक वजन बढ़ा है।

इन चुनावों का एक बड़ा संदेश भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए भी निकला है। लंबे समय तक यह धारणा बनी हुई थी कि हरियाणा भाजपा का पूरा ढांचा सिर्फ मनोहर लाल खट्टर के इर्द-गिर्द घूमता है। लेकिन अब पार्टी यह संदेश देने की कोशिश करेगी कि नेतृत्व परिवर्तन के बाद भी संगठन चुनाव जीत सकता है।यानी भाजपा अब “पोस्ट-खट्टर युग” की राजनीति को स्थिर करने की दिशा में बढ़ती दिखाई दे रही है। हालांकि असली चुनौती अभी बाकी है।


नगर निकाय चुनावों और विधानसभा चुनावों की प्रकृति अलग होती है। स्थानीय मुद्दे, स्थानीय समीकरण और उम्मीदवारों का प्रभाव भी बड़ा रोल निभाता है। इसलिए आने वाले वर्षों में नायब सैनी की असली परीक्षा सरकार चलाने, प्रशासनिक फैसलों और बड़े राजनीतिक संकटों को संभालने में होगा

किसान आंदोलन, बेरोजगारी, कर्मचारियों के मुद्दे, कानून व्यवस्था और क्षेत्रीय संतुलन जैसे विषय भविष्य में सरकार के सामने चुनौती बन सकते हैं। यदि इन मोर्चों पर सरकार दबाव में आती है तो राजनीतिक समीकरण फिर बदल सकते हैं। लेकिन फिलहाल भाजपा के भीतर जो माहौल है, उसमें नायब सैनी ने अपने आलोचकों को बड़ा जवाब दिया है।
यही वजह है कि अब राजनीतिक गलियारों में एक नई लाइन सुनाई देने लगी है— “नायब सैनी अगली क्लास में पहुंच गए हैं।”

यह लाइन सिर्फ मजाक या राजनीतिक टिप्पणी नहीं बल्कि एक प्रतीक है। प्रतीक इस बात का कि वे शुरुआती संदेहों से निकलकर अब स्थिर नेतृत्व की तरफ बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। मार्च 2024 में जब उन्होंने कुर्सी संभाली थी तब उन्हें अस्थायी माना जा रहा था। लेकिन अब डेढ़ साल बाद तस्वीर पूरी तरह बदलती दिखाई दे रही है।

राजनीति में समय बहुत तेजी से करवट लेता है। जो नेता कल कमजोर माना जा रहा होता है, वही एक चुनाव के बाद मजबूत शक्ति केंद्र बन सकता है। नायब सैनी के साथ फिलहाल कुछ ऐसा ही होता दिखाई दे रहा है।

अब सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि वे मुख्यमंत्री बने रहेंगे या नहीं। अब सवाल यह है कि क्या वे आने वाले वर्षों में अपनी अलग राजनीतिक पहचान पूरी तरह स्थापित कर पाएंगे? क्या वे हरियाणा भाजपा के भीतर अपना स्वतंत्र नेतृत्व मॉडल बना पाएंगे? और क्या वे 2029 तक पार्टी को एकजुट रख पाएंगे?
इन सवालों के जवाब भविष्य देगा।
लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि इस बार के चुनावों ने उन्हें राहत दी है, समय दिया है और सबसे बड़ी बात… राजनीतिक वैधता दी है।

यानी अगर आसान भाषा में कहा जाए तो नायब सैनी फिलहाल अपने “इम्तिहान” में पास हो गए हैं। और हरियाणा की राजनीति की अगली क्लास में बैठने का टिकट भी उन्हें मिल गया है।