दिल्ली के बेगमपुर स्थित हीरा मल्टी स्पेशियलिटी अस्पताल से जुड़े नवजात तस्करी गिरोह (Newborn trafficking gang) के मामले में पुलिस (Delhi Police) जांच में चौंकाने वाले खुलासे सामने आए हैं। पुलिस पूछताछ में गिरोह की कथित सरगना डॉ. विवेकी से कई अहम जानकारियां मिलने की बात सामने आई है। जांच के अनुसार, गिरोह निसंतान दंपतियों को सरोगेसी (surrogacy) और IVF उपचार का झांसा देकर अपने जाल में फंसाता था। आरोप है कि इसके बाद नवजात बच्चों की अवैध बिक्री का नेटवर्क चलाया जा रहा था। पुलिस अब इस नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों, अस्पताल की भूमिका और बच्चों की खरीद-फरोख्त से जुड़े संभावित कनेक्शनों की जांच कर रही है।

अधिकारियों के मुताबिक, पूछताछ के आधार पर गिरोह के काम करने के तरीके और उससे जुड़े लोगों की पहचान करने की कोशिश की जा रही है। अदालत ने शुक्रवार को मामले की कथित सरगना डॉ. विवेकी को एक दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया है। पुलिस पूछताछ में सामने आए तथ्यों के आधार पर अब डॉ. विवेकी के पति डॉ. हीरा की भूमिका की भी जांच की जा रही है। डॉ. हीरा अस्पताल के संचालन से जुड़े रहे हैं। पुलिस का कहना है कि जांच के दौरान यदि उनके खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं तो उन्हें भी पूछताछ के लिए बुलाया जाएगा।

जुड़वां बच्चे सौंपे

जांच अधिकारियों के अनुसार, ग्वालियर निवासी दंपति मुकेश और रीमा संतान प्राप्ति के लिए IVF उपचार कराने के सिलसिले में डॉ. विवेकी के संपर्क में आए थे। आरोप है कि डॉ. विवेकी ने दंपति को सरोगेसी का विकल्प बताते हुए 9 लाख रुपये के पैकेज में पुत्र प्राप्ति का भरोसा दिलाया। इसके बाद दंपति से स्पर्म और अंडाणु समेत जरूरी नमूने भी लिए गए। पुलिस जांच में सामने आया है कि इस दौरान गिरोह के सदस्य कथित सरोगेट महिला की वीडियो भेजकर दंपति को विश्वास में लेते रहे। उन्हें यह भरोसा दिलाया गया कि प्रक्रिया सही तरीके से चल रही है और जल्द ही उन्हें संतान मिल जाएगी।

पुलिस के अनुसार, गिरोह के पास बाद में 2 नवजात शिशु पहुंचे थे, जिनमें एक लड़का और एक लड़की शामिल थे। इसके बाद दंपति को यह कहकर दोनों बच्चे सौंप दिए गए कि कथित सरोगेट महिला ने जुड़वां बच्चों को जन्म दिया है। दंपति ने इस बात पर भरोसा कर दोनों बच्चों को अपना लिया। पुलिस अब अस्पताल से मिले दस्तावेजों और रिकॉर्ड की जांच कर रही है। जांच में फर्जी सरोगेसी रैकेट चलाए जाने के संकेत मिलने की बात सामने आई है। अधिकारियों का कहना है कि दस्तावेजों, मेडिकल रिकॉर्ड और अन्य साक्ष्यों के आधार पर पूरे मामले की कड़ियां जोड़ी जा रही हैं।

जांच में सामने आया है कि गिरफ्तार आरोपी साया भाई उर्फ कालिया सीधे बच्चों के माता-पिता से संपर्क नहीं करता था, बल्कि अन्य लोगों के माध्यम से नवजात शिशु हासिल करता था। पुलिस के अनुसार, आरोपी फिलहाल 5 दिन की पुलिस रिमांड पर है। पूछताछ में उसने दावा किया है कि वह डॉ. विवेकी समेत कई अन्य गिरोहों को भी नवजात शिशु उपलब्ध कराता था। हालांकि, पुलिस को अभी तक उसके दावों के समर्थन में कोई दस्तावेज नहीं मिले हैं। आरोपी से मिली जानकारी के आधार पर पुलिस की एक टीम उसे लेकर राजस्थान के पाली और गुजरात के साबरकांठा के लिए रवाना हुई है।

जांच अधिकारियों के अनुसार, अब तक 4 अन्य नवजात बच्चों के बारे में जानकारी मिली है, जिन्हें उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान और बिहार के परिवारों को बेचे जाने का आरोप है। पुलिस अब अस्पताल के रिकॉर्ड, मेडिकल दस्तावेजों और अन्य कागजात की गहन जांच कर रही है, ताकि कथित नेटवर्क से जुड़े लोगों और बच्चों की खरीद-फरोख्त की पूरी कड़ी का पता लगाया जा सके। जांच अधिकारियों का कहना है कि अस्पताल संचालन से जुड़े डॉ. हीरा की भूमिका भी जांच के दायरे में है। पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इस कथित रैकेट में उनकी कोई भूमिका थी या नहीं। जांच में सामने आने वाले तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

मध्य जिला स्पेशल स्टाफ ने गिरोह तक पहुंचने के लिए फर्जी ग्राहक बनकर उसकी सदस्य ज्योति और शालू से संपर्क किया था। पुलिस के अनुसार, 5 जून को आरोपी आरके आश्रम मेट्रो स्टेशन पर एक नवजात शिशु को सौंपने पहुंचे थे। उस समय बच्चे की हालत बेहद गंभीर थी। पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए नवजात को अस्पताल में भर्ती कराया। डॉक्टरों के मुताबिक, अगर इलाज में करीब एक घंटे की भी देरी होती तो बच्चे की जान खतरे में पड़ सकती थी। जांच में सामने आया कि नवजात को जन्म के तुरंत बाद उसकी मां से अलग कर दिया गया था और उसे मां के दूध के बजाय पैकेट वाला दूध दिया जा रहा था। चिकित्सकों के अनुसार, इससे बच्चे के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ा और उसकी हालत बिगड़ गई थी। इलाज के बाद अब नवजात की स्थिति स्थिर बताई जा रही है।

13 आरोपियों को किया था गिरफ्तार

नवजात तस्करी मामले में पुलिस की कार्रवाई लगातार जारी है। मध्य जिला स्पेशल स्टाफ ने करीब एक महीने तक चले विशेष अभियान के दौरान इस गिरोह का भंडाफोड़ करते हुए 13 आरोपियों को गिरफ्तार किया है। पुलिस के अनुसार, कार्रवाई के दौरान पांच नवजात शिशुओं को सुरक्षित बरामद किया गया। जांच एजेंसियां अब गिरोह के पूरे नेटवर्क, इसमें शामिल अन्य लोगों और नवजातों की कथित खरीद-फरोख्त से जुड़े कनेक्शनों की जांच कर रही हैं।

रेलवे स्टेशन से 8 गिरफ्तार

पुलिस ने डेढ़ वर्षीय बच्चे के अपहरण और उसे बेचने वाले गिरोह का पर्दाफाश करते हुए 8 आरोपियों को गिरफ्तार किया है। पुलिस ने बच्चे को सकुशल बरामद कर उसके परिजनों को सौंप दिया है। DCP भरत रेड्डी के अनुसार, गाजियाबाद निवासी चंद्रकुमारी का डेढ़ वर्षीय बेटा 24 मई को नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से लापता हो गया था। इसके बाद परिजनों की शिकायत पर पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की। एसएचओ विश्वनाथ के नेतृत्व में गठित टीम ने रेलवे स्टेशन और आसपास लगे CCTV कैमरों की फुटेज खंगाली। जांच के दौरान पुलिस को अहम सुराग मिले, जिसके आधार पर अपहरण और बच्चे की बिक्री से जुड़े गिरोह तक पहुंच बनाई गई।

जांच में एक महिला और उसके 2 साथियों की संलिप्तता सामने आई है। पुलिस के अनुसार, यह गिरोह बच्चों का अपहरण कर उन्हें बेचने का काम करता था। मामले की जांच के दौरान हरिद्वार पुलिस ने गिरोह के 6 सदस्यों को गिरफ्तार किया, जिन्होंने पूछताछ में दिल्ली से भी एक बच्चे के चोरी किए जाने की बात कबूल की। इसके बाद दिल्ली और उत्तराखंड पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में बदायूं से बच्चे को बरामद कर लिया गया। पुलिस पूछताछ में सामने आया कि विशाल, जिया और शिवा ने बच्चे के अपहरण की साजिश को अंजाम दिया था। वहीं धर्मेंद्र और उसकी पत्नी प्रीति कथित तौर पर बच्चे के लिए खरीदार तलाशने का काम करते थे। पुलिस के मुताबिक, पूजा ने अपनी बहन आरती के लिए बच्चे को डेढ़ लाख रुपये में खरीदा था।

खरीदारों से वसूली जाती थी अतिरिक्त रकम

बेगमपुर स्थित हीरा मल्टी स्पेशियलिटी अस्पताल से जुड़े नवजात तस्करी मामले में पुलिस जांच में नए खुलासे सामने आए हैं। पूछताछ के दौरान डॉ. विवेकी ने कथित तौर पर स्वीकार किया है कि राजस्थान और गुजरात की कई गर्भवती महिलाओं का प्रसव उसके अस्पताल में कराया गया था। प्रसव के बाद महिलाएं अपने गांव लौट जाती थीं, जबकि नवजात बच्चों को अस्पताल की दूसरी मंजिल पर बने NICU में रखा जाता था। पुलिस का कहना है कि इस हिस्से में केवल डॉक्टर की भरोसेमंद सहयोगी प्रतिभा को जाने की अनुमति थी। पुलिस जांच में यह भी सामने आया है कि बच्चों को कथित खरीदारों को सौंपने से पहले अस्पताल में रखने के नाम पर अतिरिक्त रकम भी वसूली जाती थी। जांच एजेंसियां अब अस्पताल के रिकॉर्ड, भुगतान से जुड़े दस्तावेज और अन्य साक्ष्यों की जांच कर रही हैं।

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