अमित पांडेय, खैरागढ़। शहर में मेंटेनेंस खसरा और नजूल भूमि पर बनी कथित अवैध कॉलोनी का मामला अब सिर्फ जमीन घोटाले तक सीमित नहीं रह गया है। अब सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि जब एसडीएम की जांच में अवैध प्लाटिंग की पुष्टि हो चुकी, कलेक्टर कार्यालय ने कार्रवाई के निर्देश जारी कर दिए, फिर भी नगर पालिका आखिर चुप क्यों बैठी है।

मामला शहर के सिविल लाइन क्षेत्र स्थित प्लॉट नंबर 114 और 115 का है। सरकारी रिकॉर्ड में यह जमीन कभी एडवर्ड चिल्ड्रन पार्क और बाड़ी के रूप में दर्ज थी। आजादी से पहले यहां “अल्फ्रेड पार्क” हुआ करता था। बाद में यहां राजा लालबहादुर सिंह की प्रतिमा स्थापित की गई, जिसे किसी ने चोरी करके गलाने के लिए ले गया था, लेकिन राजा शिवेंद्र बहादुर ने उसे डोंगरगढ़ स्थित लाल निवास में स्थापित कर दिया और इधर मेंटनेश खसरे की जमीन टुकड़ों में बिकती चली गई।

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सरकारी जांच रिपोर्ट के अनुसार करीब एक लाख वर्गफीट से ज्यादा जमीन को लगभग 22 हिस्सों में बांटा गया। 17 लोगों के नाम पर जमीन दर्ज हुई और कई हिस्सों की दोबारा बिक्री भी हुई। अब वहां बड़े मकान, कॉम्प्लेक्स और निर्माणाधीन भवन खड़े हैं।

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सबसे बड़ा खुलासा यह है कि नगर एवं ग्राम निवेश विभाग ने खुद अपनी रिपोर्ट में कहा है कि इस जमीन का कोई वैध ले-आउट पास नहीं हुआ था। यानी कॉलोनी काटने की अनुमति ही नहीं थी। इसके बावजूद वर्षों तक रजिस्ट्री, नामांतरण और निर्माण चलते रहे। इसके बाद एसडीएम कार्यालय ने जांच रिपोर्ट कलेक्टर कार्यालय को भेजी। फिर नजूल शाखा ने मुख्य नगर पालिका अधिकारी को पत्र जारी कर साफ निर्देश दिए कि अवैध प्लाटिंग पर छत्तीसगढ़ नगर पालिका कॉलोनाइजर नियमों के तहत कार्रवाई की जाए, लेकिन यहीं से कहानी और ज्यादा रहस्यमयी हो जाती है।

किनके इशारे पर नगर पालिका कार्रवाई करने से बच रही?

इतने गंभीर दस्तावेज सामने आने के बाद भी अब तक न कोई नोटिस जारी हुआ, न अवैध निर्माणों पर कार्रवाई हुई और न ही किसी जिम्मेदार व्यक्ति पर सख्ती दिखाई गई। यानी सरकारी कागजों में अवैध प्लाटिंग साबित है, लेकिन जमीन पर सब कुछ पहले की तरह चल रहा है। शहर में अब खुलकर चर्चा होने लगी है कि आखिर किसका दबाव है? कौन से रसूखदार लोग इस पूरे मामले में पर्दे के पीछे हैं? और किनके इशारे पर नगर पालिका कार्रवाई करने से बच रही है?

लोगों ने उठाए गंभीर सवाल

लोग तंज कस रहे हैं कि खैरागढ़ में शायद अवैध कॉलोनी बनाने से बड़ा अपराध उस पर कार्रवाई करना हो गया है, क्योंकि यहां जांच रिपोर्ट भी है, सरकारी आदेश भी है, विभागीय पत्र भी है, बस कार्रवाई नहीं है। सबसे गंभीर सवाल यह भी है कि यदि बच्चों के पार्क और मेंटेनेंस खसरा की जमीन पर बनी कॉलोनी पर भी प्रशासन कार्रवाई नहीं कर पा रहा तो फिर आम सरकारी जमीनों की सुरक्षा का क्या होगा? खैरागढ़ में यह मामला अब सीधे-सीधे प्रशासनिक निष्क्रियता, रसूखदारों के प्रभाव और संगठित भू-कारोबार पर सवाल खड़ा कर रहा है। शहर इंतजार कर रहा है, आखिर कार्रवाई पहले होगी या पूरी जमीन बिक जाने का इंतजार किया जाएगा?

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