दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट (Patiala House Court) ने यूट्यूबर अजीत भारती (Ajit Bharti) को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि भारती ने अपने वीडियो में जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया, उससे जाति व्यवस्था और जाति आधारित श्रेष्ठता की सोच को बढ़ावा मिलने की बात सामने आती है। पटियाला हाउस कोर्ट के एडिशनल सेशंस जज सौरभ प्रताप सिंह लालर ने 7 सितंबर के आदेश में कहा कि वीडियो में इस्तेमाल भाषा से जाति-आधारित पवित्रता की सोच और शादी-विवाह तथा वंश के मामलों में ऊंची जातियों की नीची जातियों पर कथित श्रेष्ठता को बढ़ावा मिलता है। अदालत ने यह टिप्पणी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत दर्ज मामले की सुनवाई के दौरान की। कोर्ट ने इसी मामले में अजीत भारती की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी।
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, यह मामला अजीत भारती के उस वीडियो से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने सांसद चंद्रशेखर आजाद के बारे में टिप्पणी की थी। चंद्रशेखर आजाद अनुसूचित जाति समुदाय से आते हैं। जज सौरभ प्रताप सिंह लालर ने भारती की टिप्पणी का उल्लेख करते हुए कहा कि आजाद को किसी ऊंची जाति की लड़की से शादी करने के योग्य बनने की बात में जाति का स्पष्ट संदर्भ है और यह अपमानजनक है। अदालत ने सवाल किया कि जो व्यक्ति अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति समुदाय में किसी से भी शादी करने के योग्य है, उसे किसी ऊंची जाति की लड़की से शादी करने के लिए अलग से योग्य बनने की जरूरत क्यों होनी चाहिए।
अपमानित करने के तत्व मौजूद थे
कोर्ट ने प्रथम दृष्टया पाया कि SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(आर) के तहत अपराध के आवश्यक तत्व मौजूद हैं। इस धारा के तहत सार्वजनिक तौर पर SC/ST समुदाय के किसी व्यक्ति को अपमानित या बेइज्जत करना अथवा जाति आधारित अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करना अपराध माना जाता है। इसी आधार पर अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि धारा 18 के तहत कानूनी रोक लागू होगी, जिसके चलते ऐसे मामले में अग्रिम जमानत नहीं दी जा सकती। यही वजह रही कि कोर्ट ने अजीत भारती की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी।
कस्टडी में पूछताछ की जरूरत नहीं थी
हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर मामले में SC/ST एक्ट के तहत अपराध के तत्व शामिल नहीं होते, तो वह भारती को राहत देने पर विचार कर सकता था। अदालत के मुताबिक, घटना प्रथम दृष्टया किसी टिप्पणी के जवाब में अचानक हुई प्रतीत होती है और आरोपी से कस्टडी में पूछताछ की आवश्यकता नहीं थी।
बालकराम बौद्ध ने दर्ज कराई थी शिकायत
जज ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि की गई टिप्पणियां सिर्फ अग्रिम जमानत याचिका पर फैसला करने तक सीमित थीं। इन टिप्पणियों का यह अर्थ नहीं निकाला जाना चाहिए कि अदालत ने भारती के दोषी या निर्दोष होने, आरोपों की सत्यता या रिकॉर्डिंग के पूरे संदर्भ पर कोई निष्कर्ष दिया है। अजीत भारती के खिलाफ 23 अगस्त को FIR दर्ज की गई थी। उन पर SC/ST एक्ट, आईटी एक्ट की धारा 67 और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं 196(1)(सी) और 351(3) के तहत मामला दर्ज किया गया है। यह शिकायत आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष बालकराम बौद्ध ने दर्ज कराई थी। मामला भारती के उस वीडियो से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने सांसद चंद्रशेखर आजाद को लेकर टिप्पणी की थी।
शिकायत में क्या आरोप?
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि अजीत भारती ने वीडियो में जाति-आधारित और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया। शिकायतकर्ता के मुताबिक, वीडियो में नगीना के सांसद चंद्रशेखर आजाद और डॉ. बीआर अंबेडकर को लेकर भी आपत्तिजनक टिप्पणियां की गईं। इसके अलावा महिलाओं के लिए अपमानजनक भाषा और धमकी दिए जाने का भी आरोप लगाया गया है। FIR के मुताबिक, भारती एक दर्शक की टिप्पणी का जवाब दे रहे थे। दर्शक ने कथित तौर पर सुझाव दिया था कि भारती अपनी बहन की शादी चंद्रशेखर आजाद से कर दें, जिससे जाति आधारित आरक्षण खत्म होने की बात कही गई थी।
शिकायत में आरोप है कि इसके जवाब में भारती ने जाति का उल्लेख करते हुए आपत्तिजनक टिप्पणी की और कहा कि सिर्फ किसी विशेष जाति से होना या सांसद होना शादी के लिए पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कथित तौर पर यह भी कहा कि आजाद को किसी सवर्ण महिला से शादी करने के लिए पहले खुद को योग्य साबित करना होगा।
भारती के वकील की दलील
अजीत भारती की ओर से पेश वकील जय अनंत देहादराई ने दलील दी कि प्रथम दृष्टया SC/ST एक्ट की धाराएं 3(1)(आर) और 3(1)(एस) इस मामले में लागू नहीं होतीं। उन्होंने कहा कि शिकायतकर्ता न तो कथित घटना के दौरान मौजूद था और न ही उसे व्यक्तिगत रूप से अपमानित या धमकाया गया था। वकील ने यह भी तर्क दिया कि सार्वजनिक तौर पर किसी खास SC/ST व्यक्ति को अपमानित किए जाने का भी मामला प्रथम दृष्टया नहीं बनता। उन्होंने कहा कि वीडियो में कही गई बातें काल्पनिक संदर्भ में थीं और किसी वास्तविक या खास महिला को लेकर नहीं कही गई थीं। देहादराई ने अदालत से कहा कि आरोपों की सही जांच बिना काट-छांट वाली पूरी रिकॉर्डिंग और उसके संदर्भ को देखने के बाद ही की जा सकती है। उन्होंने दलील दी कि गिरफ्तारी से पहले के चरण में भारती के खिलाफ किसी तरह का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
कोर्ट ने क्या कहा?
मामले पर विचार करने के बाद कोर्ट ने कहा कि भारती की टिप्पणियों में जाति के नामों का इस्तेमाल किया गया था। अदालत के मुताबिक, ये बातें किसी अचानक हुए विवाद या झगड़े के दौरान नहीं कही गई थीं, बल्कि उनकी प्रतिक्रिया का मुख्य आधार जाति का संदर्भ था। इसी निष्कर्ष के आधार पर कोर्ट ने माना कि भारती के खिलाफ SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(आर) के तहत अपराध के प्रथम दृष्टया तत्व मौजूद हैं। इसके चलते अदालत ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी।
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