अनुगुल। ओडिशा उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी भी विवाहित बेटी को केवल उसकी वैवाहिक स्थिति के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति (Compassionate Appointment) से वंचित नहीं किया जा सकता।
न्यायालय ने कहा कि यदि किसी सरकारी कर्मचारी की सेवा के दौरान मृत्यु होने पर विवाहित पुत्र को अनुकंपा नियुक्ति का अधिकार मिल सकता है, तो केवल विवाह के आधार पर विवाहित पुत्री को इस अधिकार से वंचित करना संविधान के समानता के अधिकार का उल्लंघन होगा।
यह निर्णय गौरी जेना की याचिका पर सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बिरजा प्रसन्ना सतपथी की पीठ ने सुनाया। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि विवाह किसी व्यक्ति को अनुकंपा नियुक्ति के लिए अयोग्य नहीं बनाता।
अदालत ने कहा कि अपनी पसंद के व्यक्ति से विवाह करना संविधान के तहत मिले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का हिस्सा है। ऐसे में केवल वैवाहिक स्थिति के आधार पर किसी महिला को उसके अधिकार से वंचित करना न केवल भेदभावपूर्ण है, बल्कि असंवैधानिक भी है।
पीठ ने यह भी कहा कि यह धारणा गलत है कि विवाह के बाद एक बेटी अपने मायके की जिम्मेदारियां नहीं निभा सकती। विवाहित पुत्री भी अपने माता-पिता के परिवार की देखभाल और भरण-पोषण में पूरी तरह सक्षम होती है, इसलिए उसे इस आधार पर अनुकंपा नियुक्ति से बाहर रखना संविधान के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।
न्यायालय ने राज्य सरकार के 28 जुलाई 2016 के उस निर्देश को भी रद्द कर दिया, जिसके तहत गौरी जेना के आवेदन को केवल उसके विवाहित होने के आधार पर खारिज कर दिया गया था। साथ ही, अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ता के आवेदन पर दो महीने के भीतर पुनः विचार कर कानून के अनुसार निर्णय लिया जाए।
इस फैसले को राज्य की हजारों विवाहित महिलाओं के लिए एक बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भविष्य में उन महिलाओं के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बनेगा जो अपने माता-पिता की मृत्यु के बाद अनुकंपा नियुक्ति की पात्रता रखती हैं।
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