​पटना। राजधानी की स्वास्थ्य व्यवस्था में व्याप्त रेफरल कल्चर और संवेदनहीनता का एक भयावह चेहरा शुक्रवार को सामने आया। सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल एक मरीज को इलाज के लिए घंटों एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल भटकना पड़ा। इस पूरी प्रक्रिया में मरीज का कीमती गोल्डन ऑवर बर्बाद हो गया जबकि प्रशासनिक अधिकारी अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते नजर आए।

​रेफरल की राजनीति और मरीज की पीड़ा

​दानापुर के रहने वाले 35 वर्षीय रंजन कुमार सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गए थे। उनके सिर में गहरी चोट थी और लगातार रक्तस्राव हो रहा था। स्थानीय लोगों की मदद से उन्हें ‘न्यू गार्डिनर रोड अस्पताल’ ले जाया गया, लेकिन वहां प्राथमिक उपचार के नाम पर केवल ड्रेसिंग की गई और उन्हें टांके लगाए बिना सीधे पीएमसीएच (PMCH) रेफर कर दिया गया।
​जब मरीज एंबुलेंस से पीएमसीएच पहुंचा तो वहां भी उसे तुरंत भर्ती नहीं किया गया। एंबुलेंस कर्मियों के अनुसार, अस्पताल के कंट्रोल रूम ने मरीज को लावारिस बताकर भर्ती करने से इनकार कर दिया और उन्हें एनएमसीएच (NMCH) ले जाने की सलाह दी। नतीजतन, सिर से खून बहने और असहनीय दर्द के बावजूद मरीज एक घंटे से अधिक समय तक एंबुलेंस में ही पड़ा रहा।

​अधीक्षक के हस्तक्षेप के बाद मिली राहत

​मरीज होश में था और अपना विवरण दे रहा था, फिर भी सिस्टम की संवेदनहीनता के कारण इलाज शुरू नहीं हो सका। मामला जब पीएमसीएच अधीक्षक डॉ. राजीव कुमार सिंह के संज्ञान में आया, तब उनके निजी हस्तक्षेप के बाद मरीज को इमरजेंसी वार्ड में भर्ती किया गया। अधीक्षक ने माना कि ऐसे सामान्य मामलों को भी बड़े अस्पतालों में भेज देना स्वास्थ्य व्यवस्था पर अनावश्यक बोझ डालता है।

​रेफरल कल्चर बना जानलेवा

​विशेषज्ञों का मानना है कि राजधानी के सरकारी अस्पतालों में जिम्मेदारी से बचने के लिए मरीजों को रेफर करने का चलन बढ़ गया है। प्रो. (डॉ.) नरेंद्र प्रताप सिंह के अनुसार, छोटी चोटों में भी इलाज न कर उन्हें पीएमसीएच जैसे बड़े संस्थानों पर धकेलना मरीजों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है। दुर्घटना के बाद का पहला घंटा ‘गोल्डन ऑवर’ होता है, जिसमें सही उपचार मिलने पर जान बचाई जा सकती है। लेकिन, अस्पतालों की आपसी खींचतान और कागजी औपचारिकताओं के कारण यह समय व्यर्थ ही बर्बाद हो जाता है।
​इस व्यवस्था का दोहरा दंश मरीजों और उनके परिजनों को झेलना पड़ रहा है। एक ओर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है, तो दूसरी ओर बड़े अस्पतालों की इमरजेंसी में अनावश्यक भीड़ के कारण गंभीर मरीजों के इलाज की गुणवत्ता पर भी बुरा असर पड़ रहा है। यह घटना स्पष्ट करती है कि प्रशासनिक सुधार और जवाबदेही तय किए बिना स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार संभव नहीं है।