पटना। सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार से सवाल पूछा है। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह जानना चाहा है कि पंचायती राज मंत्री दीपक कुशवाहा, जो पिछले छह महीने से न तो विधायक (MLA) हैं और न ही विधान पार्षद (MLC), फिर भी वे मंत्री पद पर कैसे बने हुए हैं? यह पूरा मामला उनके मंत्री बनने की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका से जुड़ा हुआ है।
क्या कहता है संविधान का नियम?
भारतीय संविधान के प्रावधानों के अनुसार, कोई भी व्यक्ति बिना किसी सदन (विधानसभा या विधान परिषद) का सदस्य रहे अधिकतम छह महीने तक ही मंत्री पद पर रह सकता है। इस तय सीमा के भीतर उसे किसी न किसी सदन की सदस्यता हासिल करनी होती है। याचिकाकर्ता का यह आरोप है कि दीपक कुशवाहा इस छह महीने की समयावधि के दायरे में नहीं आते हैं और इस समय सीमा के पार भी उनका मंत्री पद पर बने रहना पूरी तरह से असंवैधानिक है।
अदालत की प्रतिक्रिया और अगली तारीख
इस मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने स्पष्ट रूप से कहा कि यह पूरी तरह से कानून का शुद्ध प्रश्न है। बिहार सरकार को यह संतोषजनक जवाब देना होगा कि कोई व्यक्ति बिना विधायक या एमएलसी बने छह महीने से अधिक समय तक मंत्री पद पर कैसे काबिज रह सकता है। याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट का ध्यान इस ओर आकर्षित किया कि छह महीने की अवधि पहले ही बीत चुकी है और इसके बावजूद वे अभी भी मंत्री बने हुए हैं। इस मामले की अगली सुनवाई अब 27 अगस्त को होगी।
राजनीतिक पृष्ठभूमि
उल्लेखनीय है कि दीपक कुशवाहा रालोमो (राष्ट्रीय लोक मोर्चा) के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा के पुत्र हैं और वर्तमान में बिहार सरकार में पंचायती राज विभाग की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। इस कानूनी पेंच और सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद राज्य की राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है, क्योंकि सरकार को अब अदालत के सामने इसका ठोस कानूनी जवाब पेश करना होगा।


