सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में साफ-साफ शब्दों में कहा कि कोई भी कोर्ट किसी महिला, खासकर नाबालिग को उसकी इच्छा के खिलाफ गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। यह टिप्पणी उस समय आई जब 15 साल की एक बच्ची, जो सात महीने से अधिक समय से गर्भवती थी ने मेडिकल टर्मिनेशन की अनुमति मांगी। न्यायाधीश बीवी नागरत्ना और उज्जल भूयान की बेंच ने इस मामले को बेहद संवेदनशील नजरिये से देखते हुए कहा कि गर्भवती महिला की इच्छा और उसका निर्णय सबसे अधिक महत्वपूर्ण है, न कि उस बच्चे का जिसे अभी जन्म लेना है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी महिला को अवांछित गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, भले ही बच्चे को गोद देने का विकल्प हो।

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक फैसले में कहा कि किसी महिला को केवल इस आधार पर अवांछित गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता कि जन्म के बाद बच्चे को गोद दिया जा सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में सबसे अहम गर्भवती महिला की इच्छा, गरिमा और मानसिक शारीरिक कल्याण है, न कि केवल अजन्मे बच्चे के भविष्य की संभावना। सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग की 7 माह से अधिक गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति देते हुए यह टिप्पणी की।

अदालत ने चेतावनी भी दी कि अगर कोर्ट ऐसे मामलों में राहत देने से इनकार करेगा, तो लोग मजबूर होकर गैरकानूनी और खतरनाक तरीकों का सहारा लेंगे, जिससे महिलाओं की जिंदगी और ज्यादा खतरे में पड़ जाएगी। इस मामले में यह भी सामने आया कि 15 साल की इस बच्ची ने दो बार अपनी जिंदगी खत्म करने की कोशिश की थी, जो यह दिखाता है कि वह किस मानसिक दबाव से गुजर रही थी।

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने 15 वर्षीय लड़की को मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी की अनुमति दी। नाबालिग सात महीने से अधिक की गर्भवती है। कोर्ट ने कहा, खासकर नाबालिग को उसकी स्पष्ट इच्छा के विरुद्ध गर्भ को पूर्ण अवधि तक ढोने के लिए बाध्य करना गंभीर मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक आघात पहुंचा सकता है।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि टर्मिनेशन से मां और बच्चे दोनों के जीवन को खतरा हो सकता है। जस्टिस नागरत्ना ने इस तर्क पर सवाल उठाते हुए कहा कि अदालत टर्मिनेशन के बजाय किसी की आर्थिक सहायता या गोद देने के विकल्प पर निर्भर रहने के लिए नहीं कह सकती। उन्होंने पूछा कि यदि नाबालिग गर्भ जारी रखने को तैयार ही नहीं है, तो अदालत उसे ऐसा करने के लिए कैसे बाध्य कर सकती है।

मामला नाबालिग की मां द्वारा दायर याचिका से जुड़ा था, जिसमें मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट में निर्धारित वैधानिक समयसीमा से आगे बढ़ चुकी गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति मांगी गई थी। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि यह कहना आसान है कि वह जन्म के बाद उसे गोद दे सकती है, पर यह तर्क ऐसे मामलों में स्वीकार्य नहीं हो सकता जहां गर्भावस्था स्वयं अवांछित हो। कोर्ट ने नाबालिग (15 वर्ष) की 7 महीने से अधिक गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति दी। निर्णय में महिला की इच्छा, गरिमा और मानसिक-शारीरिक स्वास्थ्य को सर्वोपरि माना गया।

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