Rajasthan Highcourt: राजस्थान हाईकोर्ट ने साइबर अपराधों के दौरान पुलिस की ओर से बैंक खातों को पूरी तरह फ्रीज करने को गलत माना है। अदालत ने कहा कि केवल संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति का पूरा बैंक खाता फ्रीज करना विधि सम्मत नहीं है। ऐसे मामलों में मजिस्ट्रेट के आदेश की जरूरत होती है। जस्टिस अशोक कुमार जैन की एकलपीठ ने यह आदेश विक्रम सिंह व अन्य की जमानत याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिए।

अदालत ने कहा कि बीएनएसएस की धारा 106 पुलिस को संपत्ति की सीमित जब्ती का अधिकार देती है। धारा 107 के तहत किसी भी तरह की फ्रीजिंग केवल मजिस्ट्रेट के आधार पर हो सकती है। पुलिस को यह समझना होगा कि भुगतान की प्रणाली आरबीआई और भुगतान निपटान प्रणाली अधिनियम से नियंत्रित होती है, न कि पुलिस के विवेकाधिकार पर। अदालत ने सुझाव दिया कि केवल विवादित राशि पर लियन लगाया जाए, ताकि आरोपी की आजीविका प्रभावित न हो।
यह दिए निर्देश
- साइबर अपराध की सूचना मिलने पर कम से कम एएसआई स्तर का अधिकारी मामले की जांच करेगा।
- डीजीपी सुनिश्चित करें जांच करने वाले पुलिस अधिकारियों को प्रशिक्षित किया जाए।
- मामले में एफआईआर दर्ज होने के बाद बैंक आदि से सूचना लेने से पूर्व एसपी को उसकी प्रति भेजी जाएगी और उस पर स्वीकृति लेनी होगी।
- लेनदेन की सूचना लाभार्थी के बैंक या भुगतान सेवा प्रणाली के नोडल अधिकारी को दी जाएगी।
- पुलिस अधिकारी के अनुरोध पर बैंक खाते को फ्रीज नहीं किया जाएगा।
- बैंक और सेवा प्रदाता नोडल अधिकारी नियुक्ति करेंगे, ताकि पुलिस आपातकाल में उनसे संपर्क कर सके। यह सेवा 24 घंटे के लिए होगी।
- पुलिस बैंक खाते की राशि को फ्रीज करने का अनुरोध नहीं करेगी, यदि कोई बैंक पुलिस के अनुरोध पर ऐसा करता है तो बैंक व्यक्ति को हुई हानि और प्रतिष्ठा के बुकसान सहित दीवानी और फौजदारी परिणाम के लिए जिम्मेदार होगा।
- एसपी को सूचित करने के बाद पुलिस संबंधित राशि को लियन के लिए कह सकती है, लेकिन संपूर्ण खाते को ब्लॉक नहीं किया जा सकता।
- डेबिट या क्रेडिट कार्ड से ऑनलाइन खरीदारी में राशि का उपयोग हो चुका है और वह सामान में बदल चुकी है। कार्ड का दुरुपयोग बैंक और ग्राहक के बीच का मामला है।
- खाता ब्लॉक करने या भुगतान रोकने का आग्रह मिलते ही 24 घंटे में मजिस्ट्रेट को सूचित किया जाएगा। ऐसा नहीं करने पर पुलिस पर कार्रवाई हो सकती है।
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