एक ओर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की गविष्ठि यात्रा उत्तर प्रदेश में गौरक्षा के नाम पर योगी सरकार को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी ओर सरकार अपने गो-संरक्षण मॉडल, सख्त कानूनों और जमीन पर हुए कामों को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि बता रही है। यात्रा के 16वें दिन अब यह सवाल तेजी से उठने लगा है कि आखिर गौ-रक्षा के मुद्दे पर वास्तविक और ठोस काम किसने किया, मंचों से आरोप लगाने वालों ने या शासन स्तर पर नीतियां लागू करने वाली सरकार ने?

उत्तर प्रदेश में 2017 से पहले आवारा गोवंश, गोतस्करी और अवैध कटान बड़े राजनीतिक मुद्दे हुआ करते थे। ग्रामीण इलाकों में किसान फसलों को बचाने के लिए रात-रात भर खेतों की रखवाली करते थे, जबकि सीमावर्ती जिलों में गोतस्करी के नेटवर्क सक्रिय होने के आरोप लगते थे। लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद गो-संरक्षण को प्रशासनिक प्राथमिकता बनाया गया।

देश का सबसे सख्त गोवध कानून

योगी सरकार ने 2020 में उत्तर प्रदेश गो-वध निवारण (संशोधन) अध्यादेश, 2020 लागू कर उत्तर प्रदेश को देश का सबसे कठोर गो-सुरक्षा कानून वाला राज्य बना दिया। इस कानून के तहत गोवध या गोतस्करी में शामिल लोगों के खिलाफ 3 से 10 साल तक की जेल, 5 लाख रुपये तक जुर्माना, एनएसए, गैंगस्टर एक्ट और गैर-जमानती धाराओं तक का प्रावधान किया गया।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2017 से 2025 के बीच गो हिंसा और गोतस्करी से जुड़े मामलों में लगभग 36 हजार आरोपियों की गिरफ्तारी हुई। 13,793 लोगों पर गुंडा एक्ट, 14,305 मामलों में गैंगस्टर एक्ट और 178 आरोपियों पर एनएसए लगाया गया। 83 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति भी जब्त की गई। सरकार इसे जीरो टॉलरेंस नीति का प्रमाण मानती है।

7500 गोआश्रय स्थलों का नेटवर्क

योगी सरकार ने केवल कानून बनाकर खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि गोवंश संरक्षण के लिए बड़े स्तर पर बुनियादी ढांचा भी तैयार किया। वर्तमान में प्रदेश में लगभग 7,500 गोआश्रय स्थल संचालित हो रहे हैं, जहां करीब 13 लाख निराश्रित गोवंश का संरक्षण किया जा रहा है। प्रदेश में कुल गोवंश की संख्या करीब 1 करोड़ 88 लाख बताई जाती है। सरकार का दावा है कि गोवंश को सड़कों से हटाकर सुरक्षित आश्रय देने के लिए लगातार संसाधन बढ़ाए जा रहे हैं।

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डीबीटी योजना से पशुपालकों को सीधी मदद

मुख्यमंत्री सहभागिता योजना के तहत सरकार अब तक सवा लाख से अधिक पशुपालकों को 1.80 लाख से ज्यादा गोवंश सौंप चुकी है। सबसे अहम बात यह है कि सरकार गोवंश के भरण-पोषण के लिए प्रति गाय 1500 रुपये प्रतिमाह डीबीटी के माध्यम से सीधे पशुपालकों के बैंक खातों में भेज रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में इसे गो-पालन को आर्थिक गतिविधि से जोड़ने की बड़ी कोशिश माना जा रहा है। सरकार का दावा है कि इससे पशुपालकों का भरोसा बढ़ा है और निराश्रित गोवंश की समस्या को नियंत्रित करने में मदद मिली है।

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दुग्ध उत्पादन में बड़ा उछाल

गो-संरक्षण मॉडल का असर दुग्ध उत्पादन में भी दिखाई देने लगा है। वर्ष 2016-17 में जहां प्रदेश का दुग्ध उत्पादन 277 लाख मीट्रिक टन था, वहीं 2024-25 में यह बढ़कर 388 लाख मीट्रिक टन के पार पहुंच गया। सरकार इसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूती और पशुपालन आधारित आय में वृद्धि का संकेत मान रही है।

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अब गोशालाओं को केवल आश्रय स्थल नहीं

योगी सरकार अब गोशालाओं को केवल आश्रय स्थल नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था के केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में काम कर रही है। गोबर और गोमूत्र आधारित प्राकृतिक खेती मॉडल को बढ़ावा दिया जा रहा है। जैविक खाद, प्राकृतिक कीटनाशक और अन्य गो आधारित उत्पादों के माध्यम से खेती की लागत घटाने और किसानों की आय बढ़ाने की रणनीति तैयार की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह मॉडल सफल होता है तो गाय केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं रहेगी, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूत धुरी बन सकती है।

इसी बीच स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की यात्रा लगातार यूपी सरकार पर आरोप लगा रही है। लेकिन राजनीतिक और सामाजिक हलकों में अब यह सवाल उठने लगा है कि जब सरकार कानून, गोआश्रय स्थल, डीबीटी योजना, गिरफ्तारी अभियान और प्राकृतिक खेती मॉडल जैसे बड़े कदम उठा रही है, तो फिर केवल आरोपों की राजनीति कितनी प्रभावी रह जाएगी? यात्रा के 16वें दिन सबसे बड़ा सवाल यही बन गया है कि गोरक्षा के मुद्दे पर वास्तविक परिवर्तन किसने किया? मंचों से बयान देने वालों ने या जमीन पर व्यवस्था खड़ी करने वालों ने?