चंडीगढ़: बेटे की मौत के बाद उसके हक के लिए करीब 15 साल तक कानूनी लड़ाई लड़ती रही एक बुजुर्ग मां को आखिरकार पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट से राहत मिली है। हाई कोर्ट ने रेलवे दावा अधिकरण (Railway Claims Tribunal) के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें महिला के मुआवजे के दावे को ठुकरा दिया गया था। अदालत ने रेलवे को मृतक की मां को 4 लाख रुपये का मुआवजा देने के साथ इस राशि पर 9 प्रतिशत सालाना साधारण ब्याज भी अदा करने का निर्देश दिया है।
मामला 3 जुलाई 2011 का है। राकेश नाम का युवक जींद से बहादुरगढ़ जाने के लिए ट्रेन में सवार हुआ था। सफर के दौरान ट्रेन में अत्यधिक भीड़ थी। इसी बीच ट्रेन में अचानक तेज झटका लगा और राकेश संतुलन बिगड़ने के कारण नीचे गिर गया। हादसे में उसकी मौत हो गई। घटना के बाद राजकीय रेलवे पुलिस (GRP) रोहतक ने उसी दिन डीडीआर दर्ज की थी।
टिकट मिला तो दावे को नहीं किया जा सकता खारिज
मुआवजे के लिए मृतक की मां ने रेलवे दावा अधिकरण का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन 19 सितंबर 2016 को अधिकरण ने उसका दावा खारिज कर दिया। इसके बाद महिला ने हाई कोर्ट में इस फैसले को चुनौती दी।
जस्टिस हरकेश मनुजा की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि मृतक के पास से बरामद रेल टिकट वैध था और उसे फर्जी नहीं माना गया। अदालत ने परिस्थितियों को देखते हुए माना कि यह मामला ‘अवांछित घटना’ की श्रेणी में आता है। हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसी घटना में किसी प्रत्यक्षदर्शी का होना जरूरी नहीं है।
यात्री की कथित लापरवाही रेलवे की जिम्मेदारी खत्म नहीं करती
हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि यात्री की ओर से कोई लापरवाही मानी भी जाए, तो केवल इसी आधार पर रेलवे अपनी वैधानिक जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता। यानी यात्री के कथित तौर पर असावधानी बरतने को मुआवजा देने से इनकार का आधार नहीं बनाया जा सकता।
अदालत ने यह भी माना कि पिता को दावेदार के तौर पर शामिल नहीं किए जाने के कारण मां के वैध दावे को खारिज करना उचित नहीं था। मां कानूनन मृतक पर आश्रित अभिभावक के रूप में मुआवजे की हकदार है।
4 लाख रुपये पर 9 प्रतिशत ब्याज भी मिलेगा
हाई कोर्ट ने रेलवे दावा अधिकरण के वर्ष 2016 के आदेश को रद्द करते हुए रेलवे को मृतक की मां को 4 लाख रुपये की मूल मुआवजा राशि देने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही दावा दायर किए जाने की तारीख से भुगतान होने तक 9 प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज भी देना होगा।
अदालत ने रेलवे को पूरी राशि का भुगतान तीन महीने के भीतर करने का आदेश दिया है। इस तरह बेटे की मौत के बाद लंबे समय तक इंसाफ का इंतजार करती रही मां को करीब डेढ़ दशक बाद अदालत से राहत मिली है।
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