हेमंत शर्मा, इंदौर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की नई वेबसाइट और ऑनलाइन सुनवाई की व्यवस्था में सामने आ रही तकनीकी परेशानियों को लेकर हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। लगातार आ रही दिक्कतों को देखते हुए कोर्ट ने न केवल संबंधित IT व्यवस्था पर सवाल उठाए, बल्कि पूरे सिस्टम की स्वतंत्र तकनीकी जांच कराने के निर्देश भी दिए हैं। मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट के सामने वेबसाइट और ई-हियरिंग से जुड़ी समस्याओं का मुद्दा आया। सुनवाई में यह बात सामने आई कि वेबसाइट में सुधार और अपडेट के लिए समय बताए जाने के बावजूद निर्धारित अवधि के बाद भी तकनीकी परेशानियां पूरी तरह खत्म नहीं हुईं।

नई वेबसाइट, लेकिन पुरानी परेशानी खत्म नहीं

बताया गया कि 25-26 अगस्त के आसपास जजों के ग्रुप में वेबसाइट अपडेट को लेकर जानकारी साझा की गई थी, जिसमें इसे पूरा करने में करीब आठ दिन लगने की बात कही गई थी।लेकिन इसके बाद भी वेबसाइट की तकनीकी स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ।सुनवाई के दौरान मौजूद अधिवक्ताओं ने भी नई वेबसाइट को लेकर अपनी परेशानियां सामने रखीं। कुछ वकीलों ने पुरानी वेबसाइट को इस्तेमाल के लिहाज से बेहतर बताया।यानी जिस डिजिटल प्लेटफॉर्म से न्यायिक प्रक्रिया को आसान और तेज बनाने की उम्मीद थी, वही अब तकनीकी अड़चनों के कारण चर्चा में है।

IT स्टाफ की कार्यप्रणाली पर कोर्ट सख्त

तकनीकी गड़बड़ियों को गंभीरता से लेते हुए हाईकोर्ट ने संबंधित IT स्टाफ की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए हैं।कोर्ट ने चीफ जस्टिस के स्तर पर संबंधित IT स्टाफ के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश की है।इसके अलावा रजिस्ट्रार IT-CSPA के.एस. कुशवाहा को पूरे मामले की जांच कर संबंधित कर्मचारियों की भूमिका और जिम्मेदारी तय करने तथा 7 दिन के भीतर रिपोर्ट पेश करने को कहा गया है।

अब बाहरी विशेषज्ञ बताएंगे सिस्टम में कमी कहां है

हाईकोर्ट ने सिर्फ विभागीय जांच पर निर्भर रहने के बजाय स्वतंत्र IT ऑडिट कराने का फैसला किया है।इसके लिए टीसीएस, इन्फोसिस या एलएंडटी टेक्नोलॉजी सर्विसेज जैसी तकनीकी कंपनियों के विशेषज्ञों की मदद लिए जाने की संभावना है।इस ऑडिट में वेबसाइट के साथ-साथ पूरे IT सिस्टम की तकनीकी क्षमता और कार्यप्रणाली की जांच की जाएगी। ऑडिट की रिपोर्ट 30 दिन के भीतर कोर्ट के सामने पेश करनी होगी।

सिस्टम की जांच में सामने आई बफरिंग और हैंग की समस्या

सुनवाई के दौरान सिस्टम की जांच भी की गई। इस दौरान बफरिंग और सिस्टम हैंग होने जैसी परेशानियां सामने आने की बात कही गई।यही वह बिंदु है जिसने मामले को और गंभीर बना दिया है। क्योंकि ई-हियरिंग में तकनीकी रुकावट सिर्फ वेबसाइट इस्तेमाल करने की परेशानी नहीं है, बल्कि इसका असर सीधे न्यायिक कार्यवाही पर पड़ सकता है।

कोर्ट का सख्त संदेश—डिजिटल सिस्टम में लापरवाही नहीं चलेगी

हाईकोर्ट की कार्रवाई से साफ है कि अदालत डिजिटल व्यवस्था में किसी भी तरह की तकनीकी लापरवाही को हल्के में लेने के मूड में नहीं है। अब सात दिन में विभागीय जांच की रिपोर्ट सामने आएगी और 30 दिन में स्वतंत्र IT ऑडिट से यह पता लगाने की कोशिश होगी कि आखिर समस्या की जड़ कहां है।

नई वेबसाइट की तकनीकी खामी है या सिस्टम तैयार करने और संभालने में बड़ी चूक?

अब पूरा मामला इसी सवाल के इर्द-गिर्द घूम रहा है। वेबसाइट को बेहतर बनाने के दावों के बावजूद अगर कई दिनों बाद भी तकनीकी परेशानियां बनी हुई हैं, तो जिम्मेदारी तय होना जरूरी है। हाईकोर्ट के निर्देश के बाद अब सिर्फ वेबसाइट में सुधार नहीं, बल्कि पूरी IT व्यवस्था की क्षमता और जवाबदेही की परीक्षा होने वाली है।

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