Rajasthan News: सुप्रीम कोर्ट ने जयपुर के पूर्व राजपरिवार की हथरोई के पास करीब चार सौ करोड़ रुपए की संपत्ति विवाद पर हाईकोर्ट के गत 15 सितंबर के आदेश को रद्द कर दिया है। इसके साथ ही अदालत ने हाईकोर्ट को कहा है कि वह जेडीए की अपील को बहाल कर चार सप्ताह में मेरिट के आधार पर तय कर उसकी पालना रिपोर्ट पेश करे। जस्टिस जेबी पादरीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने यह आदेश जेडीए को एसएलपी पर सुनवाई करते हुए दिए।

अदालत ने कहा कि इतने बड़े सार्वजनिक हित से जुड़े विवाद को तकनीकी आधार पर खारिज करना उचित नहीं है। अपीलीय स्तर पर सुनवाई के बिना निचली अदालत के आदेश को अंतिम मान लेना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। एसएलपी में राज्य सरकार और जेडीए की ओर से एएजी शिवमंगल शर्मा ने कहा कि मामले में सार्वजनिक स्वामित्व, पूरे हो चुके भूमि अधिग्रहण, राजस्व रिकॉर्ड और संवैधानिक प्रतिबंध जैसे गंभीर प्रश्नों पर अपीलीय समीक्षा जरूरी थी। इसके बावजूद हाईकोर्ट ने केवल तकनीकी रूप से अपील को खारिज कर दिया।
हालांकि अदालत ने मामले में जेडीए पर पचास हजार रुपए की कास्ट भी लगाई है। मामले के अनुसार साल 2005 में जयपुर के पूर्व राजपरिवार ने सिविल कोर्ट में दावा किया कि यह भूमि उनकी निजी संपत्ति है और 1949 में जयपुर रियासत के भारत संघ में विलय के समय हुए समझौते के तहत मान्यता प्राप्त निजी संपत्ति का हिस्सा है।
पूर्व राजपरिवार का यह भी दावा था कि यह भूमि प्रिंसेज हाउस और प्रिंसेज क्लब से संबद्ध निजी संपत्ति है। इसके विरोध में जेडीए का कहना था कि यह भूमि न तो 1949 के समझौते की निजी संपत्तियों की सूची में शामिल थी और न कभी निजी संपत्ति के तौर पर ही दर्ज हुई। भूमि के बड़े हिस्से का अधिग्रहण साल 1993 से साल 1995 के बीच काननी तौर पर हो चुका है। उसका मुआवजा दिया गया है और उस पर सार्वजनिक विकास कार्य पूरे हो चुके हैं।
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