Rajasthan News: राजस्थान के सियासी गलियारों में इन दिनों परिवारवाद के मुद्दे पर आर-पार की जंग छिड़ गई है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के एक बयान ने सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच ऐसी चिंगारी भड़काई है, जिसने अब एक बड़े विवाद का रूप ले लिया है। दरअसल, गहलोत ने मंत्रियों को अपने बेटों को सरकारी कामकाज से दूर रखने की नसीहत दी थी, जिस पर अब मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा समेत पूरी बीजेपी हमलावर हो गई है।

गहलोत की वो नसीहत जिससे भड़की आग
बता दें कि बीते 26 मार्च को जयपुर एयरपोर्ट पर मीडिया से चर्चा के दौरान अशोक गहलोत ने एक बड़ा बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि मंत्रियों के परिजनों, खासकर उनके बेटों को सरकारी कामकाज में दखल नहीं देना चाहिए, क्योंकि इससे सरकार की छवि खराब होती है। सूत्रों की मानें तो गहलोत का यह इशारा सीधे तौर पर सत्ता के भीतर बढ़ते कथित प्रभाव की ओर था। लेकिन देखते ही देखते यह बयान उनके खुद के लिए गले की हड्डी बन गया।
BJP का पलटवार, जिनके घर कांच के होते हैं
गहलोत के इस बयान के बाद बीजेपी ने उनके पुत्र मोह को लेकर मोर्चा खोल दिया है। इस पर मदन राठौड़ और राजेंद्र राठौड़ ने कड़ा ऐतराज जताया है। मदन राठौड़, प्रदेश अध्यक्ष ने सीधे तौर पर कहा कि गहलोत खुद सालों से अपने बेटे वैभव गहलोत को राजनीति में सेट करने की कोशिश कर रहे हैं।
वहीं राजेंद्र राठौड़ ने प्रेस वार्ता कर याद दिलाया कि गहलोत ने अपने बेटे के लिए रामेश्वर डूडी जैसे कद्दावर नेताओं को किनारे कर दिया था। यही नहीं सीएम भजनलाल शर्मा ने तंज कसते हुए कहा कि सोनिया गांधी राहुल को और गहलोत वैभव को लॉन्च करने की कई नाकाम कोशिशें कर चुके हैं, जिन्हें जनता ने सिरे से नकार दिया है।
गहलोत की सफाई- मेरे बेटे ने सरकारी घर में कदम नहीं रखा
विवाद गहराता देख अशोक गहलोत ने सोशल मीडिया और मीडिया के जरिए अपनी बात स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि उनका मतलब राजनीति से नहीं, बल्कि ऑफिशियल कामकाज में दखलंदाजी रोकने से था। उन्होंने दावा किया कि मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने अपने बेटे को सरकारी आवास तक में नहीं रखा। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि अगर डॉक्टर का बेटा डॉक्टर बन सकता है, तो काबिलियत होने पर राजनेता का बेटा राजनीति में क्यों नहीं आ सकता?
20% विधायक राजनीतिक परिवारों से
राजस्थान की जमीनी हकीकत यह है कि यहां वंश ही सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी है। आंकड़ों पर नजर डालें तो करीब 20% विधायक किसी न किसी बड़े राजनीतिक घराने से ताल्लुक रखते हैं। इसमें अशोक गहलोत-वैभव गहलोत, सचिन पायलट (राजेश पायलट की विरासत), वसुंधरा राजे-दुष्यंत सिंह और दीया कुमारी जैसे बड़े नाम शामिल हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह बहस अब सिर्फ बयानबाजी तक सीमित नहीं रहेगी। आने वाले नगरीय निकाय और पंचायत चुनावों में बीजेपी इसे मेरिट बनाम वंशवाद के नैरेटिव के रूप में पेश करेगी। वहीं कांग्रेस इसे बीजेपी की ध्यान भटकाने वाली राजनीति करार दे रही है। इस खींचतान के बीच आम कार्यकर्ता खुद को ठगा सा महसूस कर रहा है, क्योंकि बड़े पदों पर आज भी विरास ही हावी नजर आती है।
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