Rajasthan Politics: जयपुर में नगर निगम चुनाव के लिए वार्ड आरक्षण की तस्वीर साफ होने के बाद टिकट को लेकर भाजपा और कांग्रेस में दावेदारी तेज हो गई है। महिला आरक्षित वार्डों में पिछले पांच साल से संगठन और जनता के बीच सक्रिय महिला कार्यकर्ताओं के सामने अब राजनीतिक परिवारों से जुड़ी महिलाओं की दावेदारी भी चुनौती बन रही है। कई वार्डों में पुरुष नेता अपनी पत्नियों को टिकट दिलाने के लिए लॉबिंग कर रहे हैं। ऐसे में टिकट वितरण में संगठन में सक्रियता और राजनीतिक प्रभाव के बीच मुकाबला देखने को मिल सकता है।

महिला के नाम पर पुरुष की राजनीति का सवाल
महिला आरक्षण का मकसद स्थानीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना है। ऐसे में टिकट की दावेदारी कर रही महिला कार्यकर्ताओं का कहना है कि प्राथमिकता उन महिलाओं को मिलनी चाहिए, जो खुद संगठन में सक्रिय रही हैं और लगातार जनता के बीच काम करती रही हैं।
दावेदारों का तर्क है कि सिर्फ पति की राजनीतिक पकड़ या परिवार के प्रभाव के आधार पर किसी महिला को टिकट देना महिला प्रतिनिधित्व की मूल भावना को कमजोर कर सकता है। इससे उन महिलाओं की मेहनत भी प्रभावित होगी, जिन्होंने वर्षों तक वार्ड में अपनी राजनीतिक पहचान बनाई है।
जयपुर में इस बार टिकट के लिए भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों के पास बड़ी संख्या में आवेदन पहुंचे हैं। 150 वार्डों के लिए करीब 5000 दावेदार सामने आए हैं। ऐसे में दोनों दलों के लिए उम्मीदवारों का चयन आसान नहीं होगा।
स्थानीय पकड़ और जीत की संभावना पर नजर
बदले हुए समीकरणों के बीच पार्टियां टिकट तय करते समय स्थानीय पकड़, सामाजिक समीकरण, बूथ स्तर की स्थिति और जीतने की संभावना को भी ध्यान में रख सकती हैं। महिला आरक्षित वार्डों में यह देखना खास होगा कि पार्टी संगठन में लंबे समय से सक्रिय महिला कार्यकर्ताओं को कितना महत्व देता है।
जयपुर शहर भाजपा के अध्यक्ष अमित गोयल ने कहा कि दावेदारी करने का अधिकार सभी कार्यकर्ताओं को है। उन्होंने कहा कि जिन वार्डों में मजबूत और सक्रिय महिला कार्यकर्ता दावेदार हैं, वहां उन्हीं को टिकट देने की कोशिश होगी।
शहर कांग्रेस अध्यक्ष सुनील शर्मा ने भी कहा कि पार्टी का प्रयास सक्रिय महिला नेता और कार्यकर्ता को टिकट देने का रहेगा। उन्होंने कहा कि जो महिलाएं वर्षों से मेहनत कर रही हैं, टिकट पर उनका पहला अधिकार रहेगा।
पांच साल की मेहनत बनाम राजनीतिक परिवार का प्रभाव
कई वार्डों में महिला कार्यकर्ताओं ने पिछले पांच वर्षों के दौरान जनसंपर्क बढ़ाया है। स्थानीय समस्याओं को उठाने से लेकर पार्टी के कार्यक्रमों में भाग लेने तक उनकी सक्रियता रही है। अब महिला आरक्षण के बाद उन्हें उम्मीद है कि पार्टी उनकी इस मेहनत को टिकट के दौरान महत्व देगी।
दूसरी ओर, कुछ वार्डों में पुरुष नेताओं की पत्नियां भी टिकट की दौड़ में हैं। ऐसे में पार्टी नेतृत्व के सामने यह तय करने की चुनौती होगी कि महिला आरक्षित वार्डों में संगठन की सक्रियता, स्थानीय पहचान और राजनीतिक प्रभाव में किसे प्राथमिकता दी जाए। अब नजर टिकट वितरण पर है। यही तय करेगा कि महिला आरक्षण के तहत मैदान में उतरने वाली महिलाओं के चयन में पार्टियां संगठन में उनकी व्यक्तिगत सक्रियता को कितना महत्व देती हैं।
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