Rajasthan Nikay Chunav 2026 के पहले चरण का मतदान खत्म होते ही भाजपा और कांग्रेस ने संभावित नतीजों के हिसाब से अपने पार्षद प्रत्याशियों को संभालना शुरू कर दिया है। ईवीएम में प्रत्याशियों की किस्मत बंद हो चुकी है, लेकिन दोनों दलों की नजर अब उन निकायों पर है जहां मुकाबला बेहद करीबी माना जा रहा है। 14 सितंबर को मतगणना के बाद बोर्ड गठन के लिए एक-एक पार्षद अहम हो सकता है।

प्रशिक्षण वर्ग और धर्म यात्रा के नाम पर तैयारी

राजस्थान में बाड़ेबंदी यानी रिसॉर्ट पॉलिटिक्स का दौर शुरू हो गया है। भाजपा ने जयपुर देहात में मतदान के तुरंत बाद ही अपने पार्षद प्रत्याशियों को लेकर कवायद शुरू कर दी। पार्टी ने बाड़ेबंदी को ‘प्रशिक्षण वर्ग’ और ‘धर्म यात्रा’ का नाम दिया है।

जयपुर देहात उत्तर जिले में तीन जगहों पर प्रशिक्षण वर्ग की तैयारी की गई है। मनोहरपुर और शाहपुरा में पार्षद प्रत्याशी रहे प्रमुख चेहरों को होटल में ठहराया गया है। चौमू और कालाडेरा में भी दो दिन बाद प्रशिक्षण वर्ग शुरू करने की तैयारी है।

इन कार्यक्रमों में चुनाव की समीक्षा के साथ संगठन से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होगी। प्रत्याशियों से वार्ड में पार्टी कार्यकर्ताओं के कामकाज का फीडबैक भी लिया जाएगा। चुनाव के दौरान प्रमुख नेताओं से मिली मदद और स्थानीय स्तर पर सामने आई कमियों पर भी चर्चा होगी।

धार्मिक स्थलों के दर्शन कराने की तैयारी

जयपुर देहात दक्षिण में भी भाजपा ने इसी तरह की तैयारी शुरू की है। जिलाध्यक्ष राजेश गुर्जर की निगरानी में प्रशिक्षण वर्ग और धर्म यात्रा की योजना बनाई गई है। जोबनेर, रेनवाल, फुलेरा, सांभर, नरैना, दूदू, फागी, बगरू, वाटिका, कानोता, बस्सी और चाकसू में पार्षद प्रत्याशियों के प्रशिक्षण वर्ग शुरू किए गए हैं।

भाजपा इन प्रत्याशियों को धर्म यात्रा पर ले जाने की भी तैयारी कर रही है। इसमें पुष्कर सरोवर, ब्रह्म मंदिर, सवाई माधोपुर का त्रिनेत्र गणेश मंदिर, खाटूश्यामजी और सालासर बालाजी सहित अन्य धार्मिक स्थलों के दर्शन कराने की योजना है।

प्रशिक्षण वर्ग में सिर्फ प्रत्याशियों को एक साथ रखने की कवायद नहीं होगी। पार्टी यह भी देखेगी कि चुनाव के दौरान संगठन ने किस वार्ड में कितना काम किया। कार्यकर्ताओं की सक्रियता कैसी रही और प्रमुख नेताओं से कितनी मदद मिली, इस पर भी चर्चा होगी।

मतगणना की तैयारी पर भी फोकस

प्रत्याशियों से आगे पार्टी के कामकाज को लेकर उनकी राय भी ली जाएगी। मतगणना के दौरान किन सावधानियों को रखना है और पूरी प्रक्रिया में प्रत्याशियों व कार्यकर्ताओं की भूमिका क्या होगी, इसकी जानकारी भी दी जाएगी। यानी भाजपा की तैयारी में चुनावी समीक्षा, संगठन का फीडबैक, मतगणना की तैयारी और संभावित बोर्ड गठन की रणनीति शामिल है।

कांग्रेस ने भी संवेदनशील निकायों पर नजर बढ़ाई

भाजपा के साथ कांग्रेस ने भी संवेदनशील निकायों की पहचान शुरू कर दी है। जहां मुकाबला बेहद करीबी है, वहां मतदान के तुरंत बाद प्रत्याशियों को एकजुट करने की तैयारी है। दूसरे निकायों में मतगणना से ठीक पहले बाड़ेबंदी की जा सकती है। जरूरत पड़ने पर प्रत्याशियों को राजस्थान से बाहर ले जाने का विकल्प भी रखा गया है। कांग्रेस की कोशिश है कि नतीजे आने के बाद क्रॉस वोटिंग या राजनीतिक सेंधमारी की स्थिति न बने और संभावित विजेता पार्षद एकजुट रहें।

निर्दलीय और बागी बन सकते हैं गेमचेंजर

इस चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के अलावा मजबूत निर्दलीय और बागी प्रत्याशियों की भूमिका भी अहम हो सकती है। कई निकायों में अगर दोनों प्रमुख दल बहुमत के आंकड़े से दूर रहते हैं तो निर्दलीय पार्षद बोर्ड गठन में निर्णायक साबित हो सकते हैं। इसी वजह से दोनों दल संभावित मजबूत निर्दलीय और बागी प्रत्याशियों पर नजर बनाए हुए हैं। नतीजों के बाद इनके समर्थन को लेकर राजनीतिक संपर्क भी बढ़ सकता है। एक पार्षद का समर्थन किसी निकाय में बोर्ड गठन का पूरा गणित बदल सकता है।

36 से 48 घंटे में ठिकाना बदलने की रणनीति

बाड़ेबंदी के दौरान पार्षदों के बाहरी संपर्क को सीमित रखने की रणनीति पर भी काम हो रहा है। संभावित तौर पर स्मार्टफोन जमा करवाकर सीमित संपर्क के लिए साधारण फोन की अनुमति दी जा सकती है। पार्षदों को एक ही होटल या रिसॉर्ट में लंबे समय तक रखने के बजाय 36 से 48 घंटे में ठिकाना बदलने की रणनीति भी बनाई जा रही है। इसका मकसद बाहरी संपर्क और संभावित राजनीतिक सेंधमारी को रोकना है। महिला प्रत्याशियों को अपने साथ परिवार के एक सदस्य को रखने की छूट दिए जाने की भी तैयारी है।

14 सितंबर को खुलेगा ईवीएम का राज

14 सितंबर को मतगणना के बाद तस्वीर साफ होगी। इसके साथ ही बाड़ेबंदी का फोकस भी बदल जाएगा। जो प्रत्याशी चुनाव हार जाएंगे, उन्हें बाहर किया जा सकता है, जबकि जीतने वाले पार्षदों को बोर्ड गठन तक साथ रखने की रणनीति अपनाई जाएगी। इसके बाद सीटों का गणित सामने होगा। किस दल के पास कितनी सीटें हैं, कितने निर्दलीय जीते हैं और कौन से बागी पार्षद किस खेमे में जा सकते हैं, इन सवालों पर सियासी गतिविधियां तेज होंगी।

20 सितंबर को अध्यक्ष और महापौर का चुनाव

नतीजों के बाद भी राजनीतिक दलों की चुनौती खत्म नहीं होगी। बोर्ड गठन तक पार्षदों को एकजुट रखना बड़ी चुनौती होगी। 20 सितंबर को महापौर, सभापति और अध्यक्ष पद के लिए चुनाव होगा। इसके अगले दिन 21 सितंबर को उपमहापौर, उपसभापति और उपाध्यक्ष पद के चुनाव के साथ बोर्ड गठन की प्रक्रिया पूरी होगी। इस तरह 14 सितंबर की मतगणना से लेकर 21 सितंबर तक राजस्थान के नगरीय निकायों में सियासी गतिविधियां तेज रहने वाली हैं।

असली सियासी परीक्षा अब

पहले चरण का मतदान खत्म हो चुका है, लेकिन राजनीतिक दलों के लिए असली परीक्षा अब शुरू हुई है। दूसरे चरण की वोटिंग और फिर ईवीएम खुलने के बाद सीटों का आंकड़ा सामने आएगा। कई निकायों में बोर्ड का फैसला केवल भाजपा और कांग्रेस की जीती सीटों से तय नहीं होगा। निर्दलीय और बागी पार्षदों का समर्थन, क्रॉस वोटिंग की आशंका और पार्षदों को अपने खेमे में बनाए रखने की रणनीति भी अहम होगी।

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