Rajasthan OBC Report: राजस्थान में OBC आरक्षण को लेकर ओबीसी आयोग ने 5 अगस्त को सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। यह रिपोर्ट पंचायत और निकाय चुनाव में ओबीसी के प्रतिनिधित्व और आरक्षण तय करने का आधार बनेगी। रिपोर्ट में ओबीसी की 92 जातियों के सामाजिक, राजनीतिक और सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व की तस्वीर सामने आई है। आंकड़ों के मुताबिक, कुछ बड़ी जातियों की राजनीति और सरकारी नौकरियों में मजबूत पकड़ है, जबकि कई जातियां अब भी प्रतिनिधित्व के मामले में बेहद पीछे हैं।

राजनीति में जाट सबसे आगे

राजस्थान में ओबीसी जातियों की राजनीतिक भागीदारी के मामले में जाट सबसे आगे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, जाट समुदाय के 22,666 परिवारों की राजनीति में भागीदारी है। इसके बाद गुर्जर दूसरे स्थान पर हैं। गुर्जर समुदाय के 9,628 परिवार राजनीति में सक्रिय हैं।

माली-सैनी-बागवान समुदाय के 5,994 परिवारों की राजनीतिक भागीदारी है। कुम्हार-प्रजापति-कुमावत के 5,823 और अहीर यानी यादव के 3,826 परिवार राजनीतिक रूप से सक्रिय हैं।

इसके बाद बढ़ई-जांगिड़-सुथार के 2,725, बिश्नोई के 2,402, कलबी-पटेल-आंजणा के 2,326 और नाई-सैन-वेदनाई के 2,079 परिवार राजनीति में भागीदारी रखते हैं।

मेव के 1,906, रावत के 1,787, साद-स्वामी-बैरागी के 1,746, सिंधी मुसलमान-सिपाही के 1,640, राईका-रैबारी-देवासी के 1,607, धाकड़ के 1,592, दरोगा-रावणा राजपूत के 1,501 और जोगी-नाथ के 1,122 परिवार भी राजनीतिक रूप से सक्रिय हैं।

आबादी के अनुपात में बिश्नोई सबसे आगे

राजनीतिक भागीदारी की कुल संख्या में जाट और गुर्जर सबसे आगे हैं। हालांकि, अपनी कुल जनसंख्या के अनुपात में राजनीतिक भागीदारी देखें तो बिश्नोई समुदाय पहले स्थान पर है।

रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश में मौजूद कुल बिश्नोई परिवारों में से 2.10 प्रतिशत परिवारों की राजनीति में भागीदारी है। यादवों की राजनीतिक भागीदारी 1.63 प्रतिशत और जाटों की 1.49 प्रतिशत है।

सरकारी नौकरी में भी बड़ी जातियों का दबदबा

ओबीसी आयोग की रिपोर्ट में सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व की तस्वीर भी सामने आई है। आंकड़ों के मुताबिक, 10 ऐसी जातियां हैं, जिनके 10 हजार से ज्यादा लोग सरकारी सेवाओं में कार्यरत हैं।

सरकारी नौकरियों में जाट सबसे आगे हैं। सरकारी सेवाओं में जाट समुदाय के 1.81 लाख लोग हैं। इसके बाद गुर्जर के 44,475, सैनी के 42,912 और यादव के 39,707 लोग सरकारी सेवा में हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, जिन ओबीसी जातियों की राजनीतिक भागीदारी मजबूत है, उनका सरकारी नौकरियों में भी प्रतिनिधित्व अधिक दिखाई देता है।

आर्थिक स्थिति में भी बड़ी जातियां आगे

आर्थिक स्थिति के मामले में भी कुछ बड़ी ओबीसी जातियां अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में हैं। जाट, पाटीदार और जांगिड़ समुदायों में बीपीएल परिवारों का प्रतिशत सबसे कम है। इन समुदायों में 8 प्रतिशत से भी कम लोग गरीबी रेखा के नीचे आते हैं।

18 जातियां सरकारी नौकरी में बेहद पीछे

रिपोर्ट में ओबीसी की कई जातियों की कमजोर स्थिति भी सामने आई है। 18 ऐसी जातियां हैं, जिनके 100 लोग भी सरकारी नौकरी में नहीं हैं।

सबसे चौंकाने वाली स्थिति सपेरा जाति की है। रिपोर्ट के अनुसार, सपेरा जाति का एक भी व्यक्ति न तो राजनीति में भागीदार है और न ही सरकारी सेवा में मौजूद है।

ओबीसी की 92 जातियों में केवल 17 जातियां ऐसी हैं, जिनके 2,000 से अधिक परिवार राजनीति में सक्रिय हैं। वहीं 22 जातियां ऐसी हैं, जिनके 100 परिवार भी राजनीतिक भागीदारी तक नहीं पहुंच पाए हैं।

सपेरा जाति की राजनीति में भी हिस्सेदारी नहीं

सपेरा जाति पूरी तरह राजनीतिक भागीदारी से बाहर है। ओबीसी में शामिल अनाथ बच्चों की भी राजनीति में कोई हिस्सेदारी नहीं है।

कई अन्य जातियों की स्थिति भी बेहद कमजोर है। 10 जातियां ऐसी हैं, जिनके केवल 2 से 8 परिवार राजनीति में भागीदारी रखते हैं। मदारी-बाजीगर के 8, चूनगर और गैर हिंदू मोची के 7-7 तथा गैर हिंदू नट और भोपा (नायक) के 5-5 परिवार राजनीति में सक्रिय हैं।

जागरी और ट्रांसजेंडर समुदाय के केवल 3-3 परिवार राजनीति में भागीदारी रखते हैं। हेला, न्यारिया (न्यारगर) और सिरकीवाल जातियों की स्थिति सबसे कमजोर है। इन तीनों के केवल 2-2 परिवार राजनीतिक रूप से सक्रिय हैं।

सरकारी नौकरियों में भी कमजोर प्रतिनिधित्व वाली जातियों की तस्वीर सामने आती है। सिरकीवाल जाति के केवल 2, हेला के 5, गन्यारिया के 6 और ट्रांसजेंडर वर्ग के केवल 8 लोग सरकारी नौकरी में हैं।

निकाय और पंचायत चुनाव में आरक्षण का आधार बनेगी रिपोर्ट

ओबीसी आयोग की यह रिपोर्ट शहरी निकायों और पंचायतीराज संस्थाओं में ओबीसी आरक्षण तय करने का आधार बनेगी। सरकार इसी रिपोर्ट के आधार पर तय करेगी कि किन निकायों में प्रमुख पद और वार्ड ओबीसी के लिए आरक्षित होंगे।

आयोग ने उन जातियों को आगे लाने के लिए विशेष प्रयास करने की सिफारिश की है, जिनकी राजनीतिक और सरकारी सेवाओं में भागीदारी कम है। रिपोर्ट में ओबीसी के भीतर मौजूद असमान प्रतिनिधित्व की तस्वीर सामने आई है।

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