संजीव, सोनीपत। गोहाना रोड स्थित छोटूराम धर्मशाला में भारतीय किसान यूनियन की किसान महापंचायत हुई। हरियाणा के अलग-अलग जिलों से किसान इसमें पहुंचे। महापंचायत में किसान नेता राकेश टिकैत मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। पत्रकारों से बातचीत में टिकैत ने गन्ने का भाव बढ़ाकर 600 रुपये प्रति क्विंटल करने की मांग की। उन्होंने कहा कि जब चीनी के दाम बढ़ रहे हैं तो इसका फायदा गन्ना किसानों को भी मिलना चाहिए।

शुगर मिलों की क्षमता बढ़ाने की मांग

राकेश टिकैत ने कहा कि किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य मिलना जरूरी है। उन्होंने कहा कि इस बार गन्ने का भाव 600 रुपये प्रति क्विंटल किया जाना चाहिए। उनके मुताबिक, उचित कीमत मिलने से किसान गन्ने की खेती के लिए और प्रोत्साहित होंगे।

टिकैत ने शुगर मिलों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि किसान जब अपनी फसल लेकर मिलों तक पहुंचते हैं तो टेंडर प्रक्रिया के कारण मिल लंबे समय तक बंद रहती हैं। इसका नुकसान किसानों को उठाना पड़ता है।

उन्होंने कहा कि हरियाणा में गन्ने के उत्पादन के हिसाब से शुगर मिलों की क्षमता पर्याप्त नहीं है। सरकार को मिलों की क्षमता बढ़ाने पर काम करना चाहिए। इससे किसानों को फसल बेचने में परेशानी नहीं होगी।

बोले- गन्ने की खेती से जमीन की सेहत सुधर सकती है

किसान नेता ने गन्ने की खेती को जमीन के लिए भी उपयोगी बताया। उन्होंने कहा कि धान और गेहूं की फसल में रासायनिक पदार्थों का इस्तेमाल अधिक होने से जमीन की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है।

टिकैत के मुताबिक, गन्ने की फसल लगातार होने से जमीन की सेहत में सुधार हो सकता है। उन्होंने कहा कि अच्छी जमीन से अच्छी पैदावार हासिल की जा सकती है।

उत्तराखंड के किसानों के बकाये का मुद्दा उठाया

राकेश टिकैत ने उत्तराखंड की शुगर मिलों में किसानों के बकाया भुगतान का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि कुछ किसानों ने उत्तराखंड की शुगर मिलों में गन्ना डाला था, लेकिन उन्हें अब तक भुगतान नहीं मिला है।

उन्होंने कहा कि उत्तराखंड और हरियाणा दोनों राज्यों में भाजपा की सरकार है। ऐसे में किसानों का बकाया पैसा जल्द से जल्द दिलाया जाना चाहिए।

बोले- गन्ना किसान खुद भी चीनी खरीदता है

टिकैत ने कहा कि गन्ना किसान खुद भी चीनी का उपभोक्ता है। जब चीनी की खपत लगातार बढ़ रही है तो गन्ना पैदा करने वाले किसान को भी इसका फायदा मिलना चाहिए।

उन्होंने कहा कि खेती नुकसान का सौदा नहीं, बल्कि फायदे का सौदा हो सकती है। लेकिन नीतिगत फैसलों और नेताओं की कलम से किसानों को नुकसान उठाना पड़ रहा है।

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