अविनाश श्रीवास्तव/​सासाराम। सरकार दिव्यांगजनों के उत्थान के लिए भले ही बड़े-बड़े दावे करे और उनके लिए विशेष दिव्यांगजन कोषांग का गठन कर दे लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों पर करारी चोट करती है। इसका ताजा उदाहरण सासाराम सदर अस्पताल से सामने आया है जहां एक दिव्यांग महिला को इलाज के लिए फर्श पर रेंगते हुए देखा गया।

​30 सालों से दिव्यांगता का दंश बुनियादी सुविधाओं का अभाव

सासाराम के खरारी गांव की निवासी भारती कुमारी पिछले 30 वर्षों से दिव्यांगता का जीवन जीने को मजबूर हैं। शारीरिक अक्षमता के कारण उनकी शादी तक नहीं हो पाई है। फिलहाल उनका भरण-पोषण उनके भाई करते हैं। भारती को सरकारी सुविधाओं के नाम पर केवल 1100 रुपये प्रतिमाह पेंशन मिल रही है जो उनके दैनिक खर्च के लिए नाकाफी है। उन्हें आज तक न तो ट्राई-साइकिल मिली है और न ही रहने के लिए सरकारी आवास की कोई सुविधा।

​अस्पताल परिसर में रेंगने को मजबूर

मौसमी बीमारी से जूझ रही भारती जब इलाज के लिए सदर अस्पताल पहुंची तो वहां का दृश्य हृदय विदारक था। भीषण उमस और गर्मी के बीच व्हीलचेयर या स्ट्रैचर की सुविधा न मिलने के कारण भारती को अस्पताल के एक विभाग से दूसरे विभाग तक अपने पैरों के सहारे घिसटते हुए जाना पड़ा। पुर्जा कटाने से लेकर डॉक्टर को दिखाने तक का पूरा सफर उन्होंने इसी तरह रेंगते हुए पूरा किया। उन्होंने बताया कि जानकारी के अभाव और सरकारी तंत्र की सुस्ती के कारण उन्हें अब तक सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाया है।

​अधिकारी का क्या है कहना?

इस मामले पर जब दिव्यांगजन कोषांग के सहायक निदेशक आफताब करीम से बात की गई तो उन्होंने बताया कि यदि संबंधित महिला आवेदन करती है तो उसे नियमानुसार सभी सरकारी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी।
​सवाल यह उठता है कि क्या एक जरूरतमंद दिव्यांग को सरकारी मदद पाने के लिए खुद चलकर अधिकारियों के पास आवेदन लेकर जाना होगा? क्या प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है कि वह ऐसे लोगों की पहचान कर उन तक सहायता पहुंचाए? भारती कुमारी की व्यथा सरकारी योजनाओं के बीच मौजूद उस बड़ी खाई को उजागर करती है जहां आम आदमी के लिए सरकारी फाइलों से निकलकर मदद का हकीकत में पहुंचना आज भी एक बड़ी चुनौती है।