कुमार इंदर, जबलपुर। मध्यप्रदेश में ओबीसी (OBC) वर्ग के गरीब वर्ग से आने वाले मेडिकल छात्रों की फीस रिंम्बर्समेंट न करने का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस गंभीर मामले पर कड़ा संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार, मध्यप्रदेश सरकार और राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग से चार सप्ताह के भीतर जवाब तलब किया है।
क्या है पूरा मामला?
मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र के रहने वाले एक छात्र ने साल 2017 में एमबीबीएस (MBBS) की पढ़ाई पूरी की थी। छात्र को अंबाला स्थित मेडिकल कॉलेज में एडमिशन मिला था। सरकार के नियमों के अनुसार, ओबीसी वर्ग के गरीब एमबीबीएस छात्रों को प्रतिवर्ष 7 लाख रुपये तक की फीस रिंम्बर्समेंट का प्रावधान है। छात्र को इस बाबत लिखित में आश्वासन पत्र (लेटर) भी मिला था कि उसकी फीस रिंम्बर्समेंट की जाएगी। सरकारी भरोसा मिलने पर छात्र ने प्रतिवर्ष 7 लाख रुपये के हिसाब से 3 वर्षों में कुल 21 लाख रुपये की भारी-भरकम फीस बैंक से एजुकेशन लोन लेकर खुद भरी।
सिर्फ 80 हजार देकर कर दी गई खानापूर्ति
छात्र का आरोप है कि पढ़ाई पूरी होने के बाद जब उसने पूरी 21 लाख रुपये की रकम वापसी का दावा किया, तो मध्यप्रदेश सरकार ने छात्र के खाते में सिर्फ 80 हजार रुपये डालकर पूरे मामले की खानापूर्ति कर दी। जब छात्र ने इसका विरोध किया, तो सरकार का रुख हैरान करने वाला था—सरकार की तरफ से कहा गया कि ऐसी फीस रिंम्बर्समेंट का कोई प्रावधान ही नहीं है।
केंद्र से आता है फंड, फिर भी नहीं मिली राहत
याचिकाकर्ता छात्र का कहना है कि केंद्र सरकार की योजना के तहत ओबीसी वर्ग के जरूरतमंद मेडिकल छात्रों की फीस रिंम्बर्समेंट के लिए केंद्र सरकार की ओर से राज्य को बजट दिया जाता है। केंद्र से फंड मिलने के बावजूद मध्यप्रदेश सरकार छात्रों को यह राहत देने से मुकर रही है।
हाईकोर्ट से झटका मिलने के बाद सुप्रीम कोर्ट की शरण
इससे पहले छात्र ने जबलपुर स्थित मध्यप्रदेश हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन हाईकोर्ट से राहत न मिलने के बाद उसने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।
याचिकाकर्ता के वकील आदित्य संघी ने बताया: “केंद्र सरकार से ओबीसी के गरीब छात्रों के लिए हर साल 7 लाख रुपये की फीस रिंम्बर्समेंट की राशि आती है। इसके बावजूद छात्र को महज 80 हजार रुपये देकर टाल दिया गया, जिसके कारण छात्र को बैंक लोन का भारी बोझ उठाना पड़ रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्र, राज्य सरकार और ओबीसी आयोग को नोटिस जारी किया है। मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद होगी।”
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