सतीश सिंह, शाहजहांपुर. आजादी की लड़ाई में जिस मिट्टी ने ठाकुर रोशन सिंह जैसा वीर क्रांतिकारी दिया, उसी मिट्टी के लोगों को आजादी के बाद भी एक पुल के लिए दशकों तक इंतजार करना पड़ा. शाहजहांपुर का नवादा गांव बारिश शुरू होते ही मानो देश-दुनिया से अलग-थलग पड़ जाता था. खन्नौत नदी उफनती तो गांव का मुख्य संपर्क टूट जाता. यह समस्या कुछ वर्षों की नहीं थी. गांव की तीन पीढ़ियां हर बरसात में इसी बेबसी के बीच बड़ी हुईं. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के फैसले आज तस्वीर बदल चुकी है. खन्नौत नदी पर बना पक्का पुल नवादा और आसपास के गांवों के लिए सिर्फ आवागमन का रास्ता नहीं, बल्कि दशकों पुरानी परेशानी से मुक्ति का प्रतीक बन चुका है.

खन्नौत नदी पर पहले पीपे के सहारे अस्थायी पुल की व्यवस्था होती थी. बारिश और बाढ़ में यह रास्ता भरोसेमंद नहीं रहता था. नदी का जलस्तर बढ़ते ही आवागमन प्रभावित हो जाता और ग्रामीणों को लंबा रास्ता तय करना पड़ता था. सबसे बड़ी परेशानी तब सामने आती जब किसी मरीज को अस्पताल ले जाना होता. बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती और किसानों के सामने अपनी उपज बाजार तक पहुंचाने की चुनौती खड़ी हो जाती. बरसात के कई महीने नवादा के लोगों के लिए हर साल एक नई परीक्षा लेकर आते थे. विडंबना यह थी कि यह वही गांव था, जहां 19 दिसंबर 1892 को ठाकुर जंगी सिंह और कौशल्या देवी के घर ठाकुर रोशन सिंह का जन्म हुआ था.

इसे भी पढ़ें : आस्था का सैलाबः आसमान से भोले के भक्तों पर बरसे फूल, मेरठ में कांवड़ियों के बीच पहुंचकर CM योगी ने बढ़ाया उत्साह

जिसने अंग्रेजों से बंदूक छीनी, उसने फांसी भी हंसकर स्वीकार की

ठाकुर रोशन सिंह बचपन से ही साहसी और कुशल निशानेबाज थे. युवावस्था में वह असहयोग आंदोलन से जुड़े और बाद में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के क्रांतिकारी आंदोलन का हिस्सा बने. 1922 में बरेली में प्रदर्शन के दौरान अंग्रेजों के लाठीचार्ज के बीच उन्होंने एक अंग्रेज अधिकारी की बंदूक छीन ली और हवा में गोली चलाकर लाठीचार्ज रुकवाया. इस मामले में उन्हें जेल जाना पड़ा. जेल से बाहर आने के बाद उनका जुड़ाव क्रांतिकारी गतिविधियों से और मजबूत हो गया. बाद में बमरौली की घटना में अंग्रेजी सरकार ने उन्हें आरोपी बनाया. काकोरी ट्रेन एक्शन के बाद ब्रिटिश सरकार ने क्रांतिकारी संगठन से जुड़े रोशन सिंह को भी मुकदमे में शामिल किया. हालांकि वह काकोरी ट्रेन कार्रवाई में प्रत्यक्ष रूप से मौजूद नहीं थे.

‘बिस्मिल को जो सजा मिली, वही मुझे दो’

अदालत में जब सजा का फैसला आया तो रोशन सिंह ने भी पीछे हटने से इनकार कर दिया. उन्होंने कहा कि उन्हें भी वही सजा दी जाए जो राम प्रसाद बिस्मिल को मिली है. 19 दिसंबर 1927 को प्रयागराज की नैनी जेल में उन्होंने फांसी के फंदे को स्वीकार किया. उनका बलिदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अमर हो गया. लेकिन शहीद के गांव की कहानी इतनी गौरवपूर्ण नहीं रही. देश स्वतंत्र हुआ, सरकारें बदलीं और विकास की योजनाएं बनीं, मगर नवादा के सामने खन्नौत नदी की वही चुनौती बरकरार रही.

इसे भी पढ़ें : UP में मानसून मेहरबान, आगरा में 94.4 और प्रयागराज में 70 मिमी बारिश

योगी सरकार के फैसले से खत्म हुआ इंतजार

प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार बनने के बाद नवादा के ग्रामीणों ने अपनी समस्या मुख्यमंत्री तक पहुंचाई. गांव वालों की मांग थी कि अस्थायी पीपे के पुल की जगह खन्नौत नदी पर स्थायी पुल बनाया जाए. जिस क्रम में 25 फरवरी 2018 को शाहजहांपुर में विकास परियोजनाओं के दौरान खन्नौत नदी पर पक्के पुल समेत सड़क और डिग्री कॉलेज जैसी परियोजनाओं को मंजूरी दी गई.वहीं 30 दिसंबर 2018 को मुख्यमंत्री ने ठाकुर रोशन सिंह के पैतृक गांव में पहुंचकर शहीद की प्रतिमा पर श्रद्धांजलि अर्पित की और उनके परिवार के बुजुर्गों से मुलाकात की.

पुल बना तो सिर्फ रास्ता नहीं खुला, गांव की उम्मीद भी लौटी

पक्का पुल बनने के बाद नवादा की जिंदगी में बड़ा बदलाव आया. अब बरसात में नदी के उफान के साथ गांव का संपर्क नहीं टूटता. मरीजों को अस्पताल पहुंचाने में सहूलियत है, छात्र नियमित रूप से स्कूल-कॉलेज जा सकते हैं और किसानों के लिए बाजार तक पहुंच आसान हुई है. इलाके में डिग्री कॉलेज और ठाकुर रोशन सिंह के पैतृक घर को स्मृति स्थल के रूप में विकसित किए जाने से शहीद की विरासत को नई पीढ़ी से जोड़ने की कोशिश भी हुई. गौरतलब है कि काकोरी एक्शन डे 9 अगस्त 1925 को हुई ऐतिहासिक घटना की याद में मनाया जाता है, जब ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ (HRA) के क्रांतिकारियों ने लखनऊ के पास काकोरी में ब्रिटिश सरकार का खजाना ले जा रही ट्रेन को रोककर लूटा था.