भिवानी के शिव मंदिर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के चौथे दिन कथाव्यास अनीता शास्त्री ने निष्कपट भक्ति और समर्पण का संदेश दिया। उन्होंने राजा अम्बरीष के जीवन प्रसंग के माध्यम से अहंकार को त्यागने की सीख दी।

अजय सैनी, भिवानी। स्थानीय भीम स्टेडियम रोड स्थित शिव मंदिर में आयोजित सप्त दिवसीय श्रीमद् भागवत महापुराण ज्ञान यज्ञ के चौथे दिन शुक्रवार को श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बनता था। कथाव्यास अनीता शास्त्री (अनीता शांडिल्य) ने प्रभु भक्ति, मानव जीवन के उच्च मूल्यों और पौराणिक प्रसंगों का सुंदर रसपान कराया। उन्होंने अपने मुख्य उद्बोधन में कहा कि परमात्मा को प्राप्त करने का एकमात्र सरल मार्ग सच्चा प्रेम और पूर्ण समर्पण है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है, जो प्रभु भक्ति के मार्ग में बाधा उत्पन्न करता है। अहंकार कभी भी किसी का भला नहीं कर सकता, इसलिए जीवन में सादगी और निष्कपट भाव को अपनाना अनिवार्य है।

राजा अम्बरीष की भक्ति का प्रसंग

कथा के दौरान अनीता शास्त्री ने मनु वंश की महिमा और सृष्टि की उत्पत्ति पर प्रकाश डाला। उन्होंने राजर्षि सत्यव्रत की सेवा और ब्रह्मा जी के आविर्भाव की कथा सुनाते हुए कश्यप, इक्ष्वाकु, हरिश्चंद्र, सगर और भागीरथ जैसे महान राजाओं के इतिहास का वर्णन किया। मुख्य रूप से उन्होंने राजा अम्बरीष के जीवन चरित्र पर चर्चा करते हुए बताया कि वे त्याग और तपस्या की साक्षात् मूर्ति थे। एक सम्राट होने के बावजूद वे सदैव ईश्वर की भक्ति में लीन रहते थे। कथाव्यास ने बताया कि भगवान अपने अनन्य भक्तों की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते हैं, जिसका प्रमाण दुर्वासा ऋषि और राजा अम्बरीष के प्रसंग से मिलता है।

अहंकार त्यागकर प्रभु में आस्था रखें

कथा के समापन पर उन्होंने बताया कि जब दुर्वासा ऋषि के क्रोध के कारण भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र उनके पीछे पड़ा, तो उन्हें कहीं शरण नहीं मिली। अंततः प्रभु के भक्त की शरण में जाने पर ही उनकी रक्षा हुई। कथाव्यास ने श्रद्धालुओं को संदेश दिया कि ईश्वर या उनके भक्तों से द्वेष रखने का परिणाम हमेशा विनाशकारी होता है। संसार की सभी भौतिक वस्तुएं क्षणभंगुर हैं, इसलिए मनुष्य को मोह-माया से ऊपर उठकर श्रेष्ठ कर्म करने चाहिए। उन्होंने आह्वान किया कि प्रभु पर अटूट विश्वास रखें, क्योंकि सत्य के मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति को संसार में किसी भी प्रकार का भय नहीं रहता और वही जीवन का वास्तविक सार है।