इदरीश मोहम्मद, पन्ना। सरकारी महकमों के आलीशान दफ्तरों में बैठकर बिना किसी दूरदर्शिता के बनाई जाने वाली योजनाएं कैसे देश के खजाने और पर्यावरण को तबाह करती हैं, इसका एक जीता-जागता उदाहरण मध्य प्रदेश के पन्ना से सामने आया है। मामला खजुराहो-पन्ना रेल लाइन परियोजना का है। जहां रेलवे के जिम्मेदार अफसरों और इंजीनियरों की घोर लापरवाही ने पन्ना के हरे-भरे जंगलों को कभी न भरने वाला जख्म दे दिया है।

हरे-भरे पेड़ों की हुई कटाई

रेलवे ने जिस पुराने रूट पर आंखें बंद करके काम शुरू करवाया, वहां जनता के टैक्स की गाढ़ी कमाई के 24.78 करोड़ रुपये पानी की तरह बहा दिए गए। इतना ही नहीं इस रूट के लिए 54,578 हरे-भरे पेड़ों को कटवा दिया गया। अब अचानक अफसरों की नींद खुली और इस पूरे रूट को ‘असुरक्षित’ बताकर रिजेक्ट कर दिया गया है।

2021 में सर्वे करने वाले इंजीनियरों की ‘अंधी’ आंखें!

रेलवे प्रशासन का अब तर्क है कि पुराने डिजाइन में 6 खतरनाक मोड़ थे। जिससे भविष्य में ट्रेन चलाना सुरक्षित नहीं था। यहां सबसे गंभीर सवाल यह उठता है कि जब साल 2021 में इस रूट का सर्वे हुआ, बकायदा GPS और आधुनिक तकनीकों से डिजाइन फाइनल किया गया, तब इन हाई-टेक इंजीनियरों को ये 6 खतरनाक मोड़ क्यों नहीं दिखाई दिए? क्या उस समय सिर्फ कागजी लिखापढ़ी पूरा करने के लिए सर्वे रिपोर्ट तैयार कर दी गई थी? 24.78 करोड़ रूपए खर्च होने और हज़ारों पेड़ों के कटने के बाद ही यह ‘खतरा’ क्यों नजर आया?

एक भूल की दोगुनी सजा: अब 50 हजार और पेड़ कटेंगे!

अफसरों की इस भारी नासमझी और लापरवाही का खामियाजा अब पन्ना के जंगलों को भुगतना पड़ रहा है। पुराने रूट को खारिज करने के बाद अब महज 1 किलोमीटर की दूरी पर एक नया रूट तय किया गया है।

इस नए ट्रैक को बिछाने के लिए 258 हेक्टेयर जंगल की जमीन दोबारा अधिग्रहित की जा रही है। इस नए रूट के चक्कर में 50,000 और पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलाई जाएगी। यानी अधिकारियों की गलत प्लानिंग की वजह से कुल मिलाकर 1 लाख 4 हजार से ज्यादा पेड़ों की सामूहिक बलि चढ़ने जा रही है।

करोड़ों की बर्बादी पर कब तय होगी जिम्मेदारी?

इस पूरे मामले के उजागर होने के बाद पन्ना उत्तर वन मंडल के डीएफओ (DFO) धीरेंद्र प्रताप सिंह ने भी मामले को संज्ञान में लिया है। लेकिन पन्ना की जनता और पर्यावरण प्रेमी इस बात से आक्रोशित हैं कि आखिर सरकारी पैसे और पर्यावरण की इस खुली ‘हत्या’ का असली जिम्मेदार कौन है?

क्या करोड़ों रुपयों को स्वाहा करने और जंगलों को उजाड़ने वाले इन लापरवाह अफसरों के खिलाफ कोई सख्त दंडात्मक कार्रवाई होगी या फिर इस महा-लापरवाही को भी ‘तकनीकी खामी’ का नाम देकर फाइलों में रफा-दफा कर दिया जाएगा?

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