सोनीपत : जिस महिला की आवाज कभी पूरे गांव की पंचायत में सुनी जाती थी, जिसने लोगों के झगड़े सुलझाए और परिवारों के बीच समझौते करवाए, आज वही महिला अपने ही परिवार से दूर वृद्धाश्रम में जिंदगी गुजार रही है। यह कहानी है सोनीपत के गोहाना क्षेत्र के बोहला गांव की पूर्व महिला सरपंच वीरमती की।

वीरमती ने वर्षों तक गांव की पंचायत की जिम्मेदारी संभाली। गांव के लोगों ने उन्हें सम्मान दिया, उनकी बात सुनी और उनके फैसलों को महत्व दिया। लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर जब उन्हें अपने बच्चों के सहारे की सबसे ज्यादा जरूरत थी, तो उनका आरोप है कि अपनों ने ही उनके साथ मारपीट और दुर्व्यवहार किया।

‘मेरी औलाद ने मुझ पर हाथ उठाया’

वृद्धाश्रम में रह रही वीरमती से जब पूछा गया कि आखिर गांव की सरपंच रह चुकी महिला को अपना घर छोड़कर यहां क्यों आना पड़ा, तो उनकी आंखों में दर्द साफ दिखाई दिया।

उन्होंने बताया कि उनकी औलाद ने उन पर हाथ उठाया। पहली बार जब उनके साथ ऐसा हुआ तो उन्होंने बच्चों को माफ कर दिया। उन्हें लगा कि शायद गलती हो गई होगी और परिवार की बात परिवार में ही खत्म हो जानी चाहिए।

लेकिन आरोप है कि इसके बाद दोबारा उनके साथ मारपीट हुई। इस बार उनके बच्चे और बहुएं भी कथित तौर पर उनके खिलाफ हो गए। इसके बाद वीरमती ने तय कर लिया कि अब वह ऐसे घर में नहीं रहेंगी, जहां उनके आत्मसम्मान और सुरक्षा की कोई जगह नहीं है।

‘जिसने पूरे गांव को संभाला, वो घर में दो बहुओं को नहीं संभाल पाई’
वीरमती कहती हैं कि उन्होंने जिंदगी भर लोगों के विवाद सुलझाए। पंचायत में बैठकर परिवारों के बीच समझौते करवाए। लेकिन आज उनकी अपनी जिंदगी ही एक ऐसे मोड़ पर आ गई है, जहां उन्हें अपने ही परिवार से दूर होना पड़ा।

वह कहती हैं कि उनके दो बेटे और तीन बेटियां हैं, लेकिन इसके बावजूद वह अकेली हैं। घर छोड़ने के बाद वह करीब चार दिन तक वहीं बैठी रहीं। उनका कहना है कि इस दौरान न कोई बेटा उन्हें लेने आया और न ही किसी बेटी का फोन आया। जिस परिवार से उन्हें सबसे ज्यादा उम्मीद थी, उसी परिवार की बेरुखी ने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया।

भाई-बहन लेने आते हैं, लेकिन वीरमती ने मना कर दिया

वीरमती के भाई और बहन भी हैं। गांव में रिश्तेदार भी हैं। उनका भाई उनसे मिलने आता है और बहन भी आती है। वे उन्हें अपने साथ चलकर रहने के लिए कहते हैं।
लेकिन वीरमती अब किसी के घर नहीं जाना चाहतीं।

उनका कहना है कि उनके भाई-बहन भी बुजुर्ग हो चुके हैं। अगर भविष्य में उन्हें कुछ हो गया तो उनके बच्चों की जिम्मेदारी भी उनके परिवार पर आएगी। वह नहीं चाहतीं कि उनकी वजह से उनके भाई-बहनों पर किसी तरह का बोझ या कलंक आए।

वह कहती हैं कि शायद उनके बच्चों की बुद्धि भ्रष्ट हो गई है। उन्हें उम्मीद है कि कभी भगवान उनकी बात सुनेंगे और शायद उनके बच्चों को अपनी गलती का एहसास होगा।

‘अब यहीं जिंदगी पूरी कर लूंगी’

वीरमती ने अब वृद्धाश्रम को ही अपना घर मान लिया है। उनका कहना है कि यहां उनकी सेवा होती है और उन्हें कम से कम सम्मान के साथ रहने को मिल रहा है। वह मानती हैं कि वृद्धाश्रम में रहना आसान नहीं है। इंसान को खुद को समझाना पड़ता है कि अब यही उसकी दुनिया है।

उनकी बातों में सबसे ज्यादा दर्द इस बात का है कि उन्होंने पूरी जिंदगी परिवार और समाज के लिए दी, लेकिन जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर उन्हें अपने ही घर का सहारा नहीं मिला।

वीरमती की कहानी अकेली नहीं, वृद्धाश्रमों पर फिर उठे सवाल
वीरमती की आपबीती ऐसे समय सामने आई है, जब मुंबई के 74 वर्षीय कपड़ा कारोबारी शिवचरण रामरत्न गुप्ता की वृद्धाश्रम में मौत ने बुजुर्गों की स्थिति को लेकर सवाल खड़े किए हैं।

शिवचरण गुप्ता पिछले करीब तीन साल से वृद्धाश्रम में रह रहे थे। 4 अगस्त को उनका निधन हो गया। उनकी पत्नी का भी करीब दो साल पहले इसी आश्रम में निधन हुआ था।

आश्रम प्रबंधन के मुताबिक, शिवचरण गुप्ता के निधन की सूचना उनकी तीनों बेटियों को दी गई थी। प्रबंधन का दावा है कि एक बेटी ने वीडियो कॉल के जरिए पिता का अंतिम संस्कार देखा और क्रियाकर्म के लिए 5,100 रुपये ऑनलाइन भेजे। वहीं, बाकी दो बेटियों के बारे में प्रबंधन के पास कोई जानकारी नहीं थी। प्रबंधन के मुताबिक, तीनों बेटियां अपनी मां के अंतिम संस्कार में भी शामिल नहीं हुई थीं।

एक तरफ वृद्धाश्रम बुजुर्गों को छत, भोजन और सेवा देने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं वीरमती जैसी कहानियां यह सवाल छोड़ जाती हैं कि क्या उम्र के आखिरी पड़ाव पर मां-बाप को अपने ही बच्चों से सम्मान पाने के लिए घर छोड़ना पड़ेगा?

कभी पूरे गांव के विवादों में न्याय और समझौते की आवाज बनी वीरमती आज अपने ही जीवन का फैसला सुना चुकी हैं—‘अब यहीं रहकर जिंदगी पूरी कर लूंगी।’

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