दिल्ली के सरकारी अस्पतालों के डिजिटलीकरण को लेकर सरकार के दावों पर दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) ने गंभीर सवाल उठाए हैं। एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान 11वीं कक्षा की एक छात्रा के अनुभव ने सरकारी दावों पर प्रश्नचिह्न लगा दिया। मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने ‘नेक्स्टजेन ई-हॉस्पिटल’ (NextGen e-Hospital) ऐप का स्वतंत्र ऑडिट कराने के निर्देश दिए हैं। सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार ने अदालत में हलफनामा दाखिल कर दावा किया कि उसके 38 सरकारी अस्पताल ‘नेक्स्टजेन ई-हॉस्पिटल’ ऐप के माध्यम से प्रभावी ढंग से संचालित हो रहे हैं और मरीजों को डिजिटल सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं।
अदालत में मौजूद 11वीं की छात्रा ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि ऐप के जरिए उसे अपेक्षित सुविधा नहीं मिल सकी। छात्रा की आपबीती सुनने के बाद अदालत ने माना कि यदि जमीनी स्तर पर डिजिटल व्यवस्था प्रभावी नहीं है, तो इसकी वास्तविक स्थिति की जांच जरूरी है। जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा की खंडपीठ ने मामले को गंभीर मानते हुए ‘नेक्स्टजेन ई-हॉस्पिटल’ ऐप का ऑडिट कराने का आदेश दिया। अदालत ने कहा कि डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं का उद्देश्य मरीजों को सुविधा देना है और यदि तकनीकी व्यवस्था में कमियां हैं तो उन्हें दूर किया जाना आवश्यक है।
मामले की सुनवाई के दौरान उस समय चौंकाने वाली स्थिति पैदा हो गई, जब दिल्ली हाईकोर्ट की खंडपीठ ने 11वीं कक्षा की छात्रा की शिकायत की सत्यता परखने के लिए अदालत में ही ‘नेक्स्टजेन आईसीयू बेड्स ऐप’ पर उपलब्ध संपर्क नंबरों पर कॉल करवाया। कई बार घंटी बजने के बावजूद किसी ने फोन रिसीव नहीं किया। इस लाइव रियलिटी चेक के बाद अदालत ने सरकार के दावों पर नाराजगी जताते हुए ऐप का प्रस्तावित डेमो तत्काल रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि यदि आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े ऐप पर दिए गए नंबर ही काम नहीं कर रहे हैं, तो इसकी कार्यप्रणाली की गंभीरता से जांच आवश्यक है। जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा की खंडपीठ ने नेक्स्टजेन टीम के अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे स्वयं दिल्ली के सभी 38 सरकारी अस्पतालों का दौरा कर ऐप की जमीनी स्थिति का आकलन करें। अदालत ने अधिकारियों को 7 अगस्त तक विस्तृत ऑडिट रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि ऐप वास्तव में मरीजों के लिए कितना प्रभावी और उपयोगी है।
‘सार्वजनिक स्वास्थ्य से समझौता नहीं किया जा सकता’
दिल्ली हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए स्पष्ट कहा कि सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं से किसी भी तरह का समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने दिल्ली सरकार को निर्देश दिया कि 30 जून से घर पर गंभीर हालत में पड़ी 70 वर्षीय बुजुर्ग महिला को तत्काल एक आईसीयू बेड उपलब्ध कराया जाए, ताकि उन्हें बिना और देरी के आवश्यक उपचार मिल सके। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सरकारी अस्पतालों की स्वास्थ्य सुविधाओं पर भी सवाल उठाए। खंडपीठ ने दिल्ली सरकार से सभी सरकारी अस्पतालों में खराब या बंद पड़ी चिकित्सा मशीनों की विस्तृत सूची प्रस्तुत करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि यह जानकारी आवश्यक है, ताकि यह आकलन किया जा सके कि मरीजों को समय पर और प्रभावी उपचार उपलब्ध कराने में कहीं संसाधनों की कमी या तकनीकी बाधाएं तो नहीं हैं।
छात्रा की सूझबूझ और बुजुर्ग दादी की पीड़ा ने खोली व्यवस्था की पोल
मामले की शुरुआत 30 जून 2026 को हुई, जब 11वीं कक्षा की एक छात्रा अपनी 70 वर्षीय दादी, जिन्हें ब्रेन हैमरेज हुआ था, को इलाज के लिए दिल्ली सरकार के जगप्रवेश चंद अस्पताल लेकर पहुंची। छात्रा के अनुसार, वहां आईसीयू बेड उपलब्ध नहीं होने के कारण उन्हें एलएनजेपी या जीटीबी अस्पताल जाने की सलाह दी गई। छात्रा ने बताया कि एलएनजेपी अस्पताल पहुंचने पर भी उन्हें आईसीयू बेड नहीं मिला। लगातार प्रयासों के बावजूद इलाज की व्यवस्था नहीं होने पर उसने दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायमित्र अशोक अग्रवाल से संपर्क किया। न्यायमित्र ने उसे ‘नेक्स्टजेन आईसीयू बेड्स ऐप’ की हेल्पलाइन का उपयोग करने की सलाह दी। छात्रा के मुताबिक, उसने ऐप पर दिए गए तीन संपर्क नंबरों पर कॉल किया, लेकिन अपेक्षित सहायता नहीं मिली। एक नंबर पर अस्पताल के एक गार्ड ने फोन उठाया और कहा कि उसे आईसीयू बेड की उपलब्धता की कोई जानकारी नहीं है। इस अनुभव के बाद छात्रा ने अदालत के समक्ष पूरी घटना रखी, जिसके बाद हाईकोर्ट ने मामले को गंभीर मानते हुए ऐप की कार्यप्रणाली की जांच और ऑडिट के आदेश दिए।
‘नेक्स्टजेन आईसीयू बेड्स ऐप’ को लेकर सरकार के दावे
दिल्ली सरकार के अनुसार, ‘नेक्स्टजेन आईसीयू बेड्स ऐप’ का उद्देश्य मरीजों और उनके परिजनों को अस्पतालों में उपलब्ध आईसीयू और अन्य बेड की जानकारी रियल टाइम में उपलब्ध कराना है, ताकि आपात स्थिति में उन्हें अस्पतालों के चक्कर न लगाने पड़ें।
ऐप की प्रमुख विशेषताएं
1. रियल-टाइम डेटा:
सरकार का दावा है कि ऐप के जरिए मरीजों को सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध आईसीयू, वेंटिलेटर और अन्य बेड की ताजा (रियल-टाइम) जानकारी मिलती है। इससे गंभीर मरीजों को समय पर उचित अस्पताल तक पहुंचने में मदद मिल सकती है।
2. पारदर्शिता:
ऐप का उद्देश्य सरकारी अस्पतालों में मरीजों और आईसीयू बेड की लाइव उपलब्धता की जानकारी आम नागरिकों और एम्बुलेंस सेवाओं तक पहुंचाना है, ताकि स्वास्थ्य सेवाओं में पारदर्शिता और बेहतर समन्वय सुनिश्चित किया जा सके।
ऐप कैसे करता है काम?
सरकार के मुताबिक, ‘नेक्स्टजेन आईसीयू बेड्स ऐप’ एक एकीकृत हॉस्पिटल मैनेजमेंट इन्फॉर्मेशन सिस्टम (HMIS) का हिस्सा है। इसमें कुल 14 मॉड्यूल शामिल हैं, जिनके माध्यम से अस्पतालों से जुड़ी विभिन्न सेवाओं और जानकारियों को ऑनलाइन उपलब्ध कराया जाता है। दावा है कि इस प्रणाली से मरीजों को बेड की उपलब्धता सहित कई स्वास्थ्य सेवाओं की जानकारी एक ही प्लेटफॉर्म पर आसानी से मिल सकती है।
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