लखनऊ. सुल्तानपुर के राजकीय मेडिकल कॉलेज में जन्मे नवजात की इलाज के अभाव में मौत के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकारी अस्पतालों की स्वास्थ्य सुविधाओं पर गंभीर सवाल उठाए हैं. कोर्ट ने कहा कि नए मेडिकल कॉलेज में अगर वेंटिलेटर, ऑक्सीजन युक्त बेड और विशेषज्ञ चिकित्सक जैसी जरूरी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं तो यह चिंता का विषय है. नवजात को बेहतर इलाज के लिए एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल रेफर किया जाता रहा, लेकिन समय पर इलाज नहीं मिल सका.
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नवजात को अस्पताल-दर-अस्पताल भेजते रहे
जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान याची की ओर से बताया गया कि नवजात का जन्म सुल्तानपुर मेडिकल कॉलेज में हुआ था. जन्म के बाद उसमें गंभीर जटिलताएं सामने आईं. बच्चे को वेंटिलेटर और बाल रोग विशेषज्ञ/सर्जन की जरूरत थी, लेकिन मेडिकल कॉलेज में ये सुविधाएं उपलब्ध नहीं हो सकीं.
KGMU से SGPGI तक नहीं मिला बेड
कोर्ट को बताया गया कि नवजात को बेहतर इलाज के लिए केजीएमयू लखनऊ रेफर किया गया, लेकिन वहां ऑक्सीजन सुविधा वाले बेड की उपलब्धता नहीं थी. इसके बाद बच्चे को डॉ. राम मनोहर लोहिया संस्थान भेजा गया, वहां भी बेड नहीं मिल सका. अंत में नवजात को एसजीपीजीआई ले जाया गया, लेकिन संबंधित विभाग में बेड उपलब्ध नहीं था. जन्म के करीब 24 घंटे के भीतर बच्चे की मौत हो गई.
HC ने दूसरे मेडिकल कॉलेजों पर भी उठाया सवाल
हाईकोर्ट ने कहा कि सुल्तानपुर जैसे नए मेडिकल कॉलेज में प्रसव हो रहे हैं तो इमरजेंसी स्थिति से निपटने के लिए जरूरी उपकरण और विशेषज्ञ डॉक्टर होने चाहिए. कोर्ट ने सवाल उठाया कि अगर नए मेडिकल कॉलेज में वेंटिलेटर और बच्चों के सर्जन जैसी सुविधाएं नहीं हैं तो प्रदेश के दूसरे मेडिकल कॉलेजों की स्थिति भी जांची जानी चाहिए.
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प्रमुख अधिकारियों को VC से जुड़ने का निर्देश
हाईकोर्ट ने चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव, केजीएमयू के कुलपति, डॉ. राम मनोहर लोहिया संस्थान के निदेशक, एसजीपीजीआई के निदेशक या उनके नामित अधिकारी और सुल्तानपुर के सीएमओ को अगली सुनवाई में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए जुड़ने का निर्देश दिया है. सभी अधिकारियों को याचिका में दिए गए तथ्यों और पूर्व के आदेशों का अध्ययन करने को कहा गया है. मामले की अगली सुनवाई 11 सितंबर को होगी.



