पटना। ​हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की ओर से संचालित स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) प्रक्रिया को वैध ठहराते हुए एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि वोटर लिस्ट को दुरुस्त करने की यह प्रक्रिया न तो मनमानी है और न ही असंवैधानिक। कोर्ट ने अपने आदेश में चुनाव आयोग के अधिकारों और उसकी सीमाओं को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया है।

​चुनावी उद्देश्यों तक सीमित है आयोग का अधिकार

​सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग के पास यह अधिकार है कि वह वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने या हटाने के लिए नागरिकता की जांच करे। हालांकि कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण भी दिया। आयोग द्वारा की गई यह जांच और लिया गया निर्णय केवल चुनावी उद्देश्यों तक ही सीमित रहेगा। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि चुनाव आयोग के पास किसी व्यक्ति को आधिकारिक या अंतिम रूप से गैर-नागरिक घोषित करने का कानूनी अधिकार नहीं है।
​इस व्यवस्था के तहत आयोग ने संदिग्ध नागरिकता के आधार पर जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए हैं उन सभी का ब्यौरा चार सप्ताह के भीतर केंद्र सरकार को सौंपने का निर्देश दिया गया है। इससे यह सुनिश्चित हो सकेगा कि नागरिकता के वास्तविक कानूनी मामलों पर सक्षम प्राधिकारी निर्णय ले सकें।

​13 राज्यों-केंद्र शासित प्रदेशों में 7.41 करोड़ नाम हटे

​SIR प्रक्रिया का दायरा काफी व्यापक रहा है। जून 2025 में बिहार से शुरू हुई यह प्रक्रिया अब तक 10 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों में पूरी की जा चुकी है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार इस दौरान कुल 7.41 करोड़ वोटर्स के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं। इनमें सबसे बड़ी संख्या उत्तर प्रदेश की है जहां 2.89 करोड़ नाम सूची से बाहर किए गए हैं।
​यह प्रक्रिया चरणों में संपन्न हो रही है। पहले चरण में बिहार, दूसरे चरण में मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, गुजरात, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, गोवा, पुडुचेरी, लक्षद्वीप और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह शामिल थे।

​आगे की राह: तीसरा चरण और दिल्ली की स्थिति

​चुनाव आयोग अब इस प्रक्रिया को और आगे बढ़ाने की तैयारी में है। तीसरे चरण में 16 राज्य और 3 केंद्र शासित प्रदेशों को कवर किया जाएगा। यह व्यापक प्रक्रिया 30 मई से शुरू होकर 23 दिसंबर तक चलेगी। वहीं दिल्ली के संबंध में भी स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं जहां 30 जून से SIR प्रक्रिया की शुरुआत होगी।
​सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय मतदाता सूची की शुद्धता और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता के बीच एक संतुलन बनाने का प्रयास है। जहां एक ओर आयोग को लिस्ट को अद्यतन करने की शक्ति दी गई है वहीं दूसरी ओर नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए नागरिकता निर्धारण की अंतिम शक्ति को सरकार के पास सुरक्षित रखा गया है। यह व्यवस्था आगामी चुनावों की विश्वसनीयता के लिए मील का पत्थर साबित हो सकती है।