रायपुर। आज विश्व संग्रहालय दिवस है. छत्तीसगढ़ में भी विश्व और भारत का प्राचीन संग्रहालय है. नाम है महंत घासीदास संग्रहालय. महंत घासीदास संग्रहालय की स्थापना 1875 में हुई थी. इस संग्रहालय में छत्तीसगढ़ में उत्खनन से प्राप्त 15 हजार से अधिक दुर्लभ पुरा अवशेषों को रखा गया है. इस संग्रहालय में एक बेशकीमती मूर्ति ‘अवलोकितेश्वर’ को भी सुरक्षित रखा गया था. जो कि सन् 1982 में चोरी हो गई थी. लेकिन अब खबर है कि 19 करोड़ की बेशकीमती दुर्लभ मूर्ति अमेरिका में मिल गई है. और इसे भारत को वापस लौटा दिया गया. वहीं इसे छत्तीसगढ़ लाने केंद्र सरकार को संस्कृति मंत्री ने चिट्ठी भी लिख दी है.
छत्तीसगढ़ लाने संस्कृति मंत्री ने केंद्र सरकार को चिट्ठी लिखी है.
दरअसल सन् 1939 में अवलोकितेश्वर की मूर्ति छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े पुरातात्विक स्थल सिरपुर में कांस्य प्रतिमाओं के साथ मिली थी. इसे 1952 में महंत घासीदास संग्रहालय में संरक्षित किया गया था. लेकिन 1982 में यह मूर्ति चोरी हो गई थी. मूर्ति चोरी के बाद भारत से इसकी तस्करी हुई और यह अमेरिका पहुँच गई. इतिहास के मुताबिक मूर्ति में कारीगर द्रोणादित्य का नाम अंकित है. शिल्पकार द्रोणादित्य सिरपुर के निवासी थे.
कुछ दिनों पहले ही अमेरिका के मैनहट्टन डिस्ट्रिक अटॉर्नी की जांच में पता चला कि अवलोकिेेतेश्वर सहि 657 प्राचीन वस्तुओं की तस्करी भारत से हुई थी. और इसे अब भारत को वापस लौटाया जाएगा. खबर है कि न्यूयॉर्क स्थित भारतीय वाणिज्य दुतावास को प्रतिमाएं सौंप दी गई है.
हालांकि मूर्ति चोरी होने का कोई रिकार्ड संग्रहालय के पास नहीं है? न ही यह जानकारी मिलती है कि मूर्ति चोरी होने पर कोई एफआईआर दर्ज हुई थी. लेकिन बताया जाता है कि पुरा अवशेषों से संबंधित एक पुस्तिका में अवलोकितेश्वर मूर्ति सिरपुर से प्राप्त होने की जानकारी जरूर है. ऐसे बिना किसी दस्तावेजी रिकार्ड के अवलोकितेश्वर को लेकर छत्तीसगढ़ का दावा कैसे मजबूत होगा यह सवालों में है?

संस्कृति मंत्री का पत्र
फिर भी अपना दावा प्रस्तुत करे हुए विभिन्न सूचना माध्यमों से प्राप्त जानकारी के आधार संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल ने केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेन्द्र शेखावत को एक पत्र लिखा है.
पत्र के मुताबिक-
प्रतिमा लेने जाएंगे मंत्री
पुरातत्व विभाग में उपसंचालक प्रताप पारख का कहना है कि अवलोकितेश्वर की मूर्ति छत्तीसगढ़ की अमूल्य धरोहर है. इसे प्राप्त करने संस्कृति मंत्री को ओर से पत्राचार किया गया है. जल्द ही प्रतिमा को लेने मंत्री और विभाग के संचालक दिल्ली जाएंगे.
चर्चा में दीमक खाने का पत्र
इस बीच एक और पत्र चर्चा में है, जो कि 6 मई 2026 को संयुक्त संचालक जे. आर. भगत की ओर से संचालक पुरातत्व को लिखा गया है. संयुक्त संचालक भगत पत्र में यह जानकारी देते हैं कि महंत घासीदास संग्रहालय में पुरा अवशेषों की अवाप्ति पंजी था उसे दीमकों ने नष्ट कर दिया है.
पत्र में यह भी कहा गया है कि पुरा अवशेषों से संग्रहित डबल लॉकर है उसे भी मिलान के लिए मेरे द्वारा 6 मई को खोला गया था. इससे खोलने पर पता चला कि लॉकर के ऊपर कुल 6 पंजी में से 5 पंजी को दीमक खा गए. पंजी नष्ट हो चुके हैं. सिर्फ 1 आवप्ति सुरक्षित है. पत्र में यह भी कहा गया कि इसकी वीडियोग्राफी और पंचनामा कराकर विभागीय संचालक को रिपोर्ट प्रस्तुत किया गया है. वहीं यह भी बताया गया है कि महंत घासीदास संग्रहालय के दुर्लभ संग्रहों की आवप्ति पंजी की मूल प्रति भोपाल पुरातत्व एवं अभिलेखागार में मौजूद है. राज्य निर्माण के पश्चात छत्तीसगढ़ को वापस किया जाना था, जो कि नहीं किया गया है. इसकी मूल या डिजिटल प्रति की मांग की गई है.
20 वर्षों से नहीं हुआ भौतिक सत्यापन ?
संयुक्त संचालक जे. आर. भगत इस बात को स्वीकार करते हैं कि संग्रहालय के पुरा अवशेषों का 15-20 वर्षों से भौतिक सत्यापन नहीं हुआ है. बीच में एक वर्ष के लिए उप संचालक रहे राहुल सिंह ने भौतिक सत्यापन किया था. उनका कहना है कि महंत घासीदास संग्रहालय में 2005 में उन्हें संग्रहाध्यक्ष नियुक्त किया गया था. तब से लेकर 2013 तक वे इस पद अधिकारिक रूप से काम करते रहे हैं. लेकिन 2013 के बाद से अमृत लाल पैकरा, प्रताप पारख और 2023 के बाद से प्रभात सिंह को संग्रहाध्यक्ष नियुक्त किया गया. वे ही सारा कार्य देखते रहे हैं. उन्होंने इन अधिकारियों की नियुक्ति को विधि विरुद्ध भी करा दिया है. उनका इनके ही संग्रहालय अध्यक्ष रहते वहाँ पर कई तरह के संधारण कार्य हुए हैं.
उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए
पुरातत्व विभाग के पूर्व उप संचलाक राहुल सिंह कहते हैं कि छत्तीसगढ़ का महंत घासीदास संग्रहालय एक धरोहर है. यहाँ के पुरा अवशेष अत्यंत प्राचीन और दुर्लभ है. ऐसे में रख-रखाव और संरक्षण में किसी भी तरह की कोई लापरवाही होना अत्यंत ही गंभीर मामला है. किसी पुरा अवशेषों से संग्रहित संग्रहालय का प्रत्येक वर्ष भौतिक सत्यापन होना आवश्यक है. महंत घासीदास में ऐसा क्यों नहीं हुआ या हो रहा है यह जाँच का विषय है. वहीं उनका कहना है कि अगर पुरा अवशेषों से संबंधित जानकारी संबंधित रजिस्टर अगर दीमक खा गए तो यह भी अत्यंत गंभीर मामला है. गंभीर मामला इसलिए भी हो जाता है कि अवलोकितेश्वर की मूर्ति से संबंधित रिकॉर्ड भी विभाग के पास मौजूद नहीं है. लिहाजा एक उच्च स्तरीय जाँच होनी चाहिए.
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