दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) ने राजधानी के सरकारी अस्पतालों में महंगे चिकित्सा उपकरणों के उपयोग को लेकर गंभीर चिंता जताई है। शुक्रवार को सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि यह बेहद हैरानी की बात है कि लगभग 50 से 60 करोड़ रुपये मूल्य के विदेशी मेडिकल उपकरण अस्पतालों में बिना इस्तेमाल के पड़े हुए हैं, जबकि मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की आवश्यकता है। अदालत ने यह टिप्पणी उस समय की जब वह दिल्ली सरकार के अस्पतालों में वेंटिलेटर सुविधा वाले ICU बेड की उपलब्धता और इमरजेंसी हेल्पलाइन की कार्यप्रणाली से जुड़े मामले में स्वतः संज्ञान लेकर सुनवाई कर रही थी। मामले की सुनवाई कर रही बेंच अस्पतालों द्वारा दाखिल उन रिपोर्टों की समीक्षा कर रही थी, जो 3 जुलाई को जारी अदालत के आदेश के बाद प्रस्तुत की गई थीं।

हाईकोर्ट ने पहले अस्पतालों को निर्देश दिया था कि वे अपने यहां उपलब्ध लेकिन उपयोग में नहीं आ रहे मेडिकल उपकरणों का विस्तृत ऑडिट कराएं। साथ ही यह भी पता लगाएं कि आखिर किन कारणों से ये मशीनें निष्क्रिय पड़ी हैं और मरीजों के उपयोग में नहीं लाई जा रही हैं। सुनवाई के दौरान सामने आया कि कई अस्पतालों में अत्याधुनिक विदेशी उपकरण केवल इसलिए उपयोग नहीं हो पा रहे हैं क्योंकि उन्हें संचालित करने के लिए पर्याप्त प्रशिक्षित मैनपावर उपलब्ध नहीं है। इसके अलावा कुछ मशीनों के संचालन के लिए आवश्यक एक्सेसरीज और तकनीकी संसाधनों की भी कमी बताई गई।

जस्टिस प्रतिभा एम सिंह और जस्टिस मनमीत पीएस की खंडपीठ ने स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए तत्काल कदम उठाने को कहा है। अदालत ने दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य सचिव और सेवा विभाग को निर्देश दिया कि वे 17 अगस्त को दिल्ली सरकार के सभी अस्पतालों के मेडिकल सुपरिटेंडेंट के साथ बैठक आयोजित करें। इस बैठक में प्रत्येक अस्पताल में उपलब्ध चिकित्सा उपकरणों की स्थिति, उनके उपयोग और आवश्यक संसाधनों की समीक्षा की जाएगी।

कोर्ट ने अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा कि सभी अस्पतालों में उपकरणों के संचालन हेतु पर्याप्त प्रशिक्षित स्टाफ उपलब्ध हो। साथ ही जिन अस्पतालों में मशीनें उपयोग में नहीं हैं और अन्य अस्पतालों में उनकी आवश्यकता है, वहां उन्हें स्थानांतरित करने की व्यवस्था की जाए। खंडपीठ ने यह भी निर्देश दिया कि जहां भी आवश्यक एक्सेसरीज, पुर्जों या मुख्य उपकरणों की कमी पाई गई है, वहां उन्हें प्राथमिकता के आधार पर उपलब्ध कराया जाए ताकि महंगे चिकित्सा उपकरणों का उपयोग शुरू हो सके और मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकें।

करोड़ों के उपकरण बेकार पड़े होने पर हाईकोर्ट की नाराजगी

दिल्ली हाईकोर्ट ने सरकारी अस्पतालों में महंगे चिकित्सा उपकरणों के अनुपयोगी पड़े रहने पर कड़ी नाराजगी जताई है। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि यह बेहद चौंकाने वाली स्थिति है कि करोड़ों रुपये मूल्य की विदेशी मशीनें अस्पतालों में बिना इस्तेमाल के पड़ी हैं, जबकि मरीजों को उनकी आवश्यकता है। खंडपीठ ने विशेष रूप से दिल्ली स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट की स्थिति पर चिंता व्यक्त की। अदालत ने कहा कि वहां उपलब्ध कई अत्याधुनिक विदेशी उपकरण उपयोग में नहीं हैं और हालात सबसे अधिक चिंताजनक दिखाई देते हैं। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि बड़ी संख्या में मशीनें केवल इसलिए निष्क्रिय पड़ी हैं क्योंकि उन्हें संचालित करने के लिए पर्याप्त स्टाफ और आवश्यक संसाधन उपलब्ध नहीं कराए गए हैं। अदालत ने सवाल उठाया कि जब करोड़ों रुपये खर्च कर उपकरण खरीदे गए हैं तो उन्हें चलाने के लिए जरूरी मानव संसाधन की व्यवस्था क्यों नहीं की गई।

दिल्ली हाईकोर्ट के निर्देश पर नेशनल इंफॉर्मेटिक्स सेंटर (NIC) द्वारा किए गए ऑडिट में दिल्ली सरकार के अस्पतालों की स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ी कई महत्वपूर्ण खामियां सामने आई हैं। अदालत ने 3 जुलाई को एनआईसी को निर्देश दिया था कि वह दिल्ली सरकार के 38 अस्पतालों में ‘नेक्स्टजेन ई-हॉस्पिटल मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम’ के क्रियान्वयन की स्थिति का आकस्मिक (सप्राइज) ऑडिट करे। कोर्ट ने एनआईसी से यह भी जांच करने को कहा था कि अस्पतालों के पोर्टल पर आईसीयू बेड की उपलब्धता की जानकारी सही और अद्यतन दिखाई जा रही है या नहीं, आईसीयू बेड से संबंधित हेल्पलाइन कॉल्स का जवाब दिया जा रहा है या नहीं तथा सभी अस्पतालों में इस डिजिटल प्रणाली को एक समान तरीके से लागू किया गया है या नहीं। इसके अलावा सिस्टम के संचालन में मौजूद कमियों की पहचान करने के भी निर्देश दिए गए थे।

ऑडिट रिपोर्ट में सामने आया कि दिल्ली सरकार के कई अस्पतालों में बड़ी संख्या में चिकित्सा उपकरण केवल इसलिए उपयोग में नहीं हैं क्योंकि उन्हें संचालित करने के लिए पर्याप्त कर्मचारी उपलब्ध नहीं हैं या फिर उनके संचालन के लिए आवश्यक एक्सेसरीज और सहायक उपकरणों की कमी है। रिपोर्ट के अनुसार, कुछ अस्पतालों में स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक पाई गई। खंडपीठ ने विशेष रूप से Delhi State Cancer Institute का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां अनुपयोगी पड़े उपकरणों की संख्या काफी अधिक है। अदालत ने सवाल उठाया कि करोड़ों रुपये की लागत से खरीदे गए महंगे उपकरणों को लंबे समय तक निष्क्रिय क्यों रहने दिया गया और उन्हें चालू करने के लिए आवश्यक कदम समय रहते क्यों नहीं उठाए गए।

नेशनल इंफॉर्मेटिक्स सेंटर (NIC) की ऑडिट रिपोर्ट का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि अस्पताल के स्टोर में 400 वेंटिलेटर और 910 ऑक्सीजन कंसंट्रेटर बिना इस्तेमाल के पड़े मिले। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि अस्पताल की ईसीजी मशीन काम नहीं कर रही थी और यह स्पष्ट नहीं किया गया कि उसके विकल्प के रूप में कोई दूसरी मशीन उपलब्ध थी या नहीं। जस्टिस Prathiba M. Singh और जस्टिस Manmeet P. S. Arora की खंडपीठ ने इस स्थिति को स्वास्थ्य सेवाओं के लिए गंभीर चिंता का विषय बताते हुए तत्काल सुधारात्मक कदम उठाने के निर्देश दिए।

अदालत ने दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य सचिव को निर्देश दिया कि वे एनआईसी की ऑडिट रिपोर्ट सभी सरकारी अस्पतालों के मेडिकल सुपरिटेंडेंट को भेजें और उसमें चिन्हित कमियों की विस्तृत समीक्षा करें। इन कमियों में स्टाफ की कमी, तकनीकी मैनपावर की अनुपलब्धता, कंप्यूटर सिस्टम से जुड़ी समस्याएं और चिकित्सा उपकरणों के संचालन में आ रही बाधाएं शामिल हैं। कोर्ट ने स्वास्थ्य सचिव को यह भी निर्देश दिया कि वे इन कमियों को दूर करने के लिए उठाए गए कदमों का विस्तृत ब्यौरा तैयार कर रिपोर्ट के रूप में अदालत के समक्ष प्रस्तुत करें। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाए कि अस्पतालों में उपलब्ध उपकरणों और सुविधाओं का प्रभावी उपयोग हो सके।

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