सत्या राजपूत, रायपुर। राजधानी रायपुर से महज 30-35 किलोमीटर दूर एक ऐसा गांव, जहां शिक्षा का सपना तालाब के किनारे, बंदरों के हमले और सांप-बिच्छू के डर के बीच जीवित है. नवीन प्राथमिक शाला का नाम तो कागजों में दर्ज है, लेकिन हकीकत में न स्कूल भवन है, न शौचालय, न पीने का पानी और ना ही ग्राउंड है. दो साल पहले पुरानी जर्जर भवन को तोड़ दिया गया, लेकिन नया भवन आज तक नहीं बना है. बच्चे निर्माणाधीन सामुदायिक भवन के सहारे पढ़ रहे हैं, जहां सिर्फ चार खंभों पर छत डली है, बाकी सब हवाई महल जैसा है.
लल्लूराम डॉट कॉम की टीम जब ग्राम कोसरंगी, थाना खरोरा, विधानसभा आरंग पहुंची तो बच्चों, शिक्षकों और अभिभावकों के चेहरों पर एक ही भाव दिखा, वह डर का है. चाहे ये डर नन्हे मुन्ने बच्चों के भविष्य को लेकर हो या फिर उनके जान का हो.


बच्चों ने कहा – हमें स्कूल और ग्राउंड चाहिए
कक्षा 1 से 5वीं के विद्यार्थियों से जब पूछा गया कि उन्हें क्या चाहिए तो सबने एक स्वर में कहा कि हमें स्कूल चाहिए. एक विद्यार्थी ने कहा, गर्मी में पसीने में भीग जाते हैं, बारिश में पूरा गीला हो जाते हैं. बैग भी भीग जाता है. खेलने के लिए खिलौने गिल्ली-डंडा, क्रिकेट सेट, फुटबॉल आए हैं, लेकिन ग्राउंड नहीं है, इसलिए सिर्फ देखकर रह जाते हैं.
एक पांचवीं कक्षा की लड़की ने शर्माते हुए कहा, शौचालय नहीं है, बाहर जाना पड़ता है. लोग गुजरते रहते हैं, बहुत शर्म आती है. स्कूल में पानी नहीं है. बच्चे घर से पानी लाते हैं. खाना भी यहीं पढ़ते-पढ़ते खाते हैं. थाली और हाथ तालाब में धोते हैं. तीसरी कक्षा का एक बच्चा बोला, बंदर अच्छा लगता है देखने में लेकिन अंदर घुस आता है. काटने दौड़ता है. तालाब से सांप आ जाते हैं. तालाब में गिरने का डर लगा रहता है.

दो बार डीईओ को पत्र लिखने के बाद भी कुछ नहीं हुआ : प्रधानपाठक
शिक्षिका ने कहा, बच्चों के लिए स्कूल भवन बहुत जरूरी है. कल कुछ हो गया तो हमें दोषी ठहराया जाएगा. दो-तीन कक्षाएं एक साथ लगती है. अतिरिक्त कक्षा में भी सामान रखा रहता है. प्रधानपाठक नन्हे लाल साहू ने कहा, ब्लॉक शिक्षा अधिकारी और जिला शिक्षा अधिकारी को दो बार पत्र लिख चुका हूं. उच्च अधिकारियों को जानकारी है, लेकिन आगे क्या हुआ पता नहीं है. विद्यार्थी हैं, शिक्षक हैं, लेकिन स्कूल भवन नहीं है.
पंचायत की मांग और नाकामी
पंच जितेंद्र कुमार साहू ने बताया कि स्कूल को शिक्षा विभाग के आदेश पर ही तोड़ा गया था. विभाग को पता है कि यहां स्कूल भवन नहीं है, लेकिन दो साल से कोई संज्ञान नहीं लिया गया है. पंचायत फंड से घेरा जरूर लगाया गया, लेकिन भवन नहीं बना. कई बार विधायक जो मंत्री भी हैं उनको पत्र दिए गए हैं. गांव में सुशासन तिहार और जनचौपाल भी लगा, वहां भी शिकायत की गई, लेकिन कुछ नहीं हुआ. कुमारी साहू पंच ने दुख जताते हुए कहा, दुर्भाग्य है कि बच्चों से उनका बचपन छीना जा रहा है. खेल सामान हैं तो ग्राउंड नहीं, गुरुजी हैं तो स्कूल भवन नहीं है.
ग्रामीणों ने उठाए ये सवाल
राजधानी के इतने करीब, मंत्री-विधायक वाले क्षेत्र में प्राथमिक स्कूल की यह हालत क्यों?
कागजों में स्कूल घूम रहा है, लेकिन बच्चों की सुरक्षा और भविष्य कौन देखेगा?
दो साल से क्यों नहीं बन पाया स्कूल भवन?
बच्चे जान हथेली पर रखकर पढ़ाई कर रहे, इसके जिम्मेदार कौन?
शासन-प्रशासन को ध्यान देने की जरूरत
अभिभावक हर दिन चिंता में रहते हैं कि बच्चा सुरक्षित घर लौटेगा या नहीं. शिक्षक नौकरी जाने के डर में मीडिया से भी डरते हैं. यह माहौल शिक्षा का नहीं, बल्कि सरवाइवल का है। नवीन प्राथमिक शाला कोसरंगी नाम में नवीन है, लेकिन नई शुरुआत की सख्त जरूरत है. शिक्षा विभाग, जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को अब इस खुले स्कूल पर तुरंत ध्यान देना चाहिए वरना मासूमों का भविष्य तालाब, बंदर और डर के भरोसे छोड़ दिया जाएगा.
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