हेमंत शर्मा, इंदौर। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर इंदौर में कुछ ऐसा ही भावुक और प्रेरणादायी दृश्य देखने को मिला। संस्था सार्थक की ओर से शुक्रवार को दिव्यांगजनों के साथ भव्य तिरंगा यात्रा निकाली गई। कोठारी मार्केट पार्किंग से शुरू हुई यह यात्रा गांधी हॉल पहुंची, जहां राष्ट्रगान के साथ इसका समापन हुआ।यात्रा में बड़ी संख्या में दिव्यांग भाई-बहन व्हीलचेयर पर शामिल हुए। हाथों में तिरंगा लेकर जब वे शहर की सड़कों से गुजरे तो यह सिर्फ एक यात्रा नहीं रही, बल्कि पूरे समाज के सामने एक मजबूत संदेश बन गई—शरीर की कोई भी कमी इंसान के हौसले को नहीं रोक सकती।

जब व्हीलचेयर के पहियों ने थामी देशभक्ति की रफ्तार

तिरंगा यात्रा की सबसे खास तस्वीर थी व्हीलचेयर पर बैठे दिव्यांगजनों के हाथों में लहराता तिरंगा।जहां सामान्य तौर पर किसी यात्रा में कदमों की आहट सुनाई देती है, वहां इस यात्रा में व्हीलचेयर के पहियों ने राष्ट्रभक्ति की कहानी लिखी। चेहरे पर मुस्कान, हाथों में तिरंगा और दिल में देश के प्रति सम्मान लिए दिव्यांगजन आगे बढ़ते रहे।यह दृश्य उन तमाम धारणाओं को भी चुनौती देता नजर आया, जिनमें दिव्यांगता को कमजोरी समझ लिया जाता है।इन लोगों ने अपने जज्बे से बता दिया कि शरीर की सीमाएं हो सकती हैं, लेकिन सपनों और देश के प्रति प्रेम की कोई सीमा नहीं होती।

पद्मश्री सत्येंद्र सिंह लोहिया ने किया नेतृत्व

तिरंगा यात्रा का नेतृत्व पद्मश्री सत्येंद्र सिंह लोहिया ने किया। उनके साथ अलग-अलग खेलों के पैरा खिलाड़ी, दिव्यांग उद्यमी और कला के क्षेत्र में अपनी पहचान बना चुके दिव्यांग साथी भी शामिल हुए।यात्रा में पैरा टेबल टेनिस की नेशनल प्लेयर और ऑल इंडिया रैंक 5 हर्षिता शहरी तथा ऑल इंडिया रैंक 10 भविष्य जैन की मौजूदगी भी रही।इन खिलाड़ियों की उपलब्धियां इस बात का उदाहरण हैं कि सही अवसर और मजबूत हौसला मिले तो दिव्यांगजन भी देश और समाज का नाम रोशन कर सकते हैं।

सिर्फ सहानुभूति नहीं… सम्मान और बराबरी चाहिए

संस्था सार्थक के अध्यक्ष दीपक जैन टीनू ने कहा कि दिव्यांगता किसी व्यक्ति की क्षमता को खत्म नहीं करती।उन्होंने कहा कि देश के पैरा खिलाड़ी, दिव्यांग उद्यमी और अलग-अलग क्षेत्रों में काम कर रहे दिव्यांग साथी लगातार अपनी प्रतिभा साबित कर रहे हैं।तिरंगा यात्रा का उद्देश्य दिव्यांगजनों को सिर्फ सहानुभूति देना नहीं, बल्कि सम्मान, समान अवसर और समान भागीदारी का संदेश देना है।उन्होंने कहा कि जब व्हीलचेयर पर बैठे दिव्यांग भाई-बहन हाथ में तिरंगा लेकर राष्ट्र के सम्मान में आगे बढ़ते हैं, तो यह पूरे समाज के लिए प्रेरणा का दृश्य बन जाता है।

तिरंगे ने मिटाई ‘कमजोरी’ की तस्वीर

इस यात्रा ने एक और जरूरी सवाल समाज के सामने रखा—क्या दिव्यांगता को हमेशा किसी की कमजोरी के तौर पर ही देखा जाना चाहिए?

जवाब इस यात्रा में शामिल लोगों ने अपने हौसले से दिया

किसी ने खेल के मैदान में अपनी पहचान बनाई है, किसी ने कारोबार को संभाला है तो किसी ने कला के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा दिखाई है। ये लोग सिर्फ मदद के हकदार नहीं हैं, बल्कि उन्हें अपनी क्षमता दिखाने के लिए बराबर के अवसर और सम्मान की जरूरत है।तिरंगा यात्रा इसी सोच को आगे बढ़ाने की एक कोशिश बनी।

गांधी हॉल पहुंचकर राष्ट्रगान के साथ हुआ समापन

कोठारी मार्केट पार्किंग से शुरू हुई यात्रा शहर के प्रमुख मार्गों से होते हुए गांधी हॉल पहुंची। यहां राष्ट्रगान के साथ तिरंगा यात्रा का समापन हुआ।राष्ट्रगान के दौरान हाथों में तिरंगा लिए खड़े और बैठे दिव्यांगजनों के चेहरे पर गर्व साफ दिखाई दे रहा था।यह पल भावुक भी था और प्रेरणादायी भी। क्योंकि इन लोगों ने सिर्फ स्वतंत्रता दिवस नहीं मनाया, बल्कि अपने जज्बे से यह संदेश दिया कि देश के प्रति प्रेम किसी शारीरिक क्षमता का मोहताज नहीं होता।

इंदौर के लिए छोड़ गई एक बड़ा संदेश

संस्था सार्थक की यह पहल स्वतंत्रता दिवस के उत्सव से आगे बढ़कर सामाजिक संदेश बन गई।तिरंगे के साथ निकले दिव्यांगजनों ने समाज से कहा कि उन्हें दया की नजर से नहीं, बल्कि सम्मान और बराबरी की नजर से देखा जाए।उनकी व्हीलचेयर के पहिए भले सड़क पर चल रहे थे, लेकिन उनके भीतर का आत्मविश्वास किसी के सहारे का मोहताज नहीं था।यह तिरंगा यात्रा उन लोगों की कहानी थी, जिन्होंने अपने हौसले से बता दिया—देश के लिए दिल धड़कता हो, तो कदमों का साथ होना जरूरी नहीं।

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