देहरादून. धामी के मंत्रिमंडल में तीन प्रकार के मंत्री हैं. संघी, असंघी और उज्याड़ू बल्द. कुछ उज्याड़ू बल्द तो फिर कांग्रेस में हरा-भरा देखकर बाड़ फांदना चाहते हैं. भाजपा की सरकारों ने उत्तराखंड को पलायन, बेरोजगारी, महिला अत्याचार, असंतुलित विकास, महंगाई आदि के दंश तो दिए ही दिए हैं. तीन ऐसे रोग भी दे दिए हैं, जिनको रोज भुगतना पड़ रहा है. आग, बाघ और जाम. मैंने इस व्यथा को उकेरा तो एक उज्याड़ू बल्द ने बजाय मेरी कही हुई बात पर आवश्यक जांच करने और कदम उठाने के, यह कह दिया कि हरीश रावत तो नेपाली जैसा लगता है. बंदर, लंगूर, भालू ही नहीं वह भी बाहर से ही आया है.

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आगे हरीश रावत ने कहा, अरे भैय्या मैं नेपाली ही लगता हूं, क्योंकि उत्तराखंड हिमालयी राज्य है. यहां के अधिकांश लोग मेरे जैसे ही पहाड़ी लगते हैं. मुझे अपनी इस पहचान पर गर्व है. मैंने कभी अपने को ऊंचा दर्शाने के लिए लोगों की तरह अपने आपको बंगाली या बिहारी नहीं बताया है. लोगों ने अपने को श्रेष्ठ जताने के लिए अपना मूल, बिहार, बंगाल में तलाशा है. मेरे सुझाव पर अमल करने के बजाय प्रश्न उठाने वालों को मैं कर्तव्यपूर्ति हेतु जगाने के लिए पुनः कह रहा हूं कि हमारे राज्य के अंदर दूसरे राज्यों से बंदर, लंगूर, भालू इत्यादि पकड़ कर यहां छोड़े जा रहे हैं.

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ऐसे सभी वन्य जीव असामान्य शारीरिक बनावट वाले हैं. बाघ, आग और जाम उत्तराखंड की व्यथा है. जब तक निदान नहीं होगा मैं इस प्रश्न को बार-बार उठाऊंगा. इस खतरे को मजाक में नहीं उड़ाया जा सकता है. लोगों को गांव में खेती तो छोड़िए बाड़ी को भी आवाद करना कठिन हो गया है. जीवन को भालू, गुलदार और हाथी से खतरा है और खेती को सुअर, बंदर, लंगूर के साथ अब मोर आदि से भी खतरा होने लग गया है. यदि कोई व्यक्ति गांव में कुछ करना भी चाहता है, उसकी मेहनत पर यह सब वन्य जीव पानी फेर दे रहे हैं. मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि कुछ लोगों में अपने पद के लायक गंभीरता क्यों नहीं है? ऐसे उज्याड़ू बल्दों की मानसिकता से लोकतंत्र, समाज और परिवेश तीनों को खतरा है.