संजीव शर्मा, कोंडागांव। बस्तर अंचल की अनोखी आदिवासी परंपरा ‘बंधा मातौर’ महापर्व का आयोजन कोंडागांव जिले के ग्राम बरकई में शनिवार को भव्य रूप से किया गया। तीन साल बाद आयोजित हुए इस पारंपरिक तालाब महोत्सव में जिलेभर से सैकड़ों लोग शामिल हुए। तालाब में एक साथ उतरकर मछली पकड़ने की इस अनोखी परंपरा को देखने और इसमें हिस्सा लेने के लिए दूर-दूर से लोग पहुंचे। पड़ोसी राज्य ओडिशा से भी बड़ी संख्या में लोग बरकई गांव पहुंचे।

बंधा मातौर बस्तर और कोंडागांव अंचल की प्राचीन आदिवासी परंपरा है। यह केवल मछली पकड़ने का आयोजन नहीं, बल्कि गांव की एकता, सामूहिकता और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक माना जाता है।
बरकई गांव में हर वर्ष प्रमुख देव भंगाराम के सम्मान में मड़ई का आयोजन किया जाता है, जिसे “बरहपाली की मड़ई” भी कहा जाता है। इसी मड़ई उत्सव के दौरान तालाब महोत्सव यानी बंधा मातौर आयोजित किया जाता है।
अलग-अलग साधनों से की गई मछली पकड़ने की प्रतियोगिता
इस महोत्सव में सभी समाज और समुदाय के लोग एक साथ तालाब में उतरकर मछलियां पकड़ते हैं। आयोजन समिति के सदस्य मिलन कुमार पाण्डे ने बताया कि जिले के किसी भी गांव का व्यक्ति इसमें भाग ले सकता है। मछली पकड़ने के लिए अलग-अलग साधनों के अनुसार शुल्क तय किया गया था। जाली, सौंकी और चगोड़ी जैसे उपकरणों से मछली पकड़ने वालों के लिए टिकट रखा गया, जबकि हाथ से मछली पकड़ने वालों को निःशुल्क प्रवेश दिया गया। सुरक्षा के मद्देनजर 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के तालाब में उतरने पर रोक लगाई गई थी।
रहस्यमयी परंपरा बनी आकर्षण का केंद्र
इस महोत्सव की सबसे खास और रहस्यमयी परंपरा मालगुजार से जुड़ी मानी जाती है। ग्रामीणों के अनुसार, जब तालाब किनारे विशेष धुन बजाई जाती है तो मछलियां पानी से उछलने लगती हैं। वहीं मालगुजार के पानी में उंगली डालते ही मछलियां अचानक गायब हो जाती हैं। इस अनोखी परंपरा को देखने के लिए लोग काफी उत्साहित नजर आए।
तालाब किनारे पूरे दिन मेले जैसा माहौल बना रहा। लोगों ने मछली पकड़ने के साथ पारंपरिक उत्सव का आनंद लिया। बरकई का यह बंधा मातौर महोत्सव अब केवल गांव का आयोजन नहीं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है।
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