प्रतीक पटनायक, धमतरी। एक पुरानी कहावत है, जहां गंगा जमुना बहती है वहां प्यास कैसी, लेकिन आज हम आपको छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले की एक ऐसी तस्वीर दिखा रहे, जो इस कहावत को पूरी तरह झुठलाती है। धमतरी जिसे एशिया के सबसे बड़े बांधों में से एक गंगरेल बांध का वरदान प्राप्त है उसी जिले का एक गांव आज बूंद-बूंद पानी के लिए मोहताज है। कहते हैं कि पानी ही जीवन है, लेकिन यहां के लोग दूसरे गांव से पानी खरीदकर पीने को मजबूर हैं। पानी की समस्या के चलते अब तक चार परिवार गांव छोड़ चुके हैं। पूरा मामला धमतरी के नगरी विकासखंड के रामपुर गांव का है।
दरअसल रामपुर गांव की कहानी किसी फिल्म की पटकथा जैसी लगती है, लेकिन यह हकीकत बहुत कड़वी है। जिला मुख्यालय से महज 18 किलोमीटर की दूरी पर बसे इस गांव में पिछले दो वर्षों से भीषण पेयजल संकट छाया हुआ है। गांव में नल जल योजना के तहत हर घर में पाइपलाइन बिछाई गई, टोंटियां लगाई गई, लेकिन उन टोंटियों से पानी के बजाय सिर्फ हवा निकलती है।

प्रशासन ने दावे तो बड़े-बड़े किए, लेकिन प्यास बुझाने का उनका तंत्र पूरी तरह फेल हो चुका है। हालात इतने खराब हैं कि ग्रामीण अपनी प्यास बुझाने के लिए जमीन खोदने को मजबूर हैं। गड्ढे खोदकर पानी की तलाश की जा रही है, जो अपने आप में मानवीय गरिमा के साथ बड़ा खिलवाड़ है। जहां पानी मिल भी रहा है वह इतना नहीं कि पूरा गांव अपनी जरूरतें पूरी कर सके। ऐसे में ग्रामीण एक किलोमीटर दूर दूसरे गांव से पानी खरीदकर पीने को मजबूर हैं।


जिनके पास पैसे नहीं उन्हें नहीं मिलता पानी
फारसी में एक कहावत है आजिज शवद आदमी दर गुरेज यानी जब इंसान हर तरफ से बेबस लाचार हो जाता है तो अंत में उसके पास भागने पलायन करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता। यह कहावत उन ग्रामीणों के दर्द को बयां करती है, जो अपना घर छोड़ने पर मजबूर हैं। यह केवल पलायन नहीं बल्कि उनकी बेबसी की पराकाष्ठा है। सबसे बड़ा दर्द यह है कि यदि ग्रामीण के पास पैसे नहीं हैं तो उन्हें पानी नहीं मिलता। खेत वाले बोरवेल से पानी देना बंद कर देते हैं। सोचिए उस शख्स पर क्या बीतती होगी, जिसे जीने के लिए सबसे बुनियादी जरूरत पानी के लिए रोज मोलभाव करना पड़ रहा हो।

गांव के चार परिवार कर चुके पलायन, बाकी भी कगार पर
पानी की इस जद्दोजहद ने गांव के सामाजिक ढांचे को भी तहस नहस कर दिया है। सुबह से शाम तक का वक्त या तो पानी ढोने में बीत जाता है या पानी तलाशने में गांव के जो 25 परिवार हैं उनकी रोजी रोटी छिन गई है। मेहनत मजदूरी का काम छूट गया है। जब इंसान की बुनियादी जरूरतें पूरी न हों तो वह पलायन न करे तो क्या करे। पिछले कुछ समय में ही गांव के चार परिवार अपना घर बार छोड़कर पलायन कर चुके हैं। अब जो बचे हैं वे भी इसी कगार पर खड़े हैं।
बहुत नीचे गिर गया है जल स्तर : कलेक्टर
प्रशासन तक शिकायत पहुंची। टीम मुआयना करने गांव आई, लेकिन नतीजा आज भी शून्य है। प्रशासन का कहना है कि दो फसलें लेने के कारण जलस्तर बहुत नीचे गिर गया है। ग्रामीणों से अनुरोध किया गया है कि डबल फसल न लें। क्या यह तर्क उन लोगों के लिए काफी है, जो रोज अपनी जमीन का टुकड़ा छोड़कर पानी की तलाश में बेघर हो रहे हैं। बिन पानी सब सून यह कहावत आज धमतरी के रामपुर गांव की सबसे बड़ी सच्चाई बन चुकी है।
ठोस कदम नहीं उठाए तो पूरा गांव हो सकता है खाली
सवाल यह है कि क्या सरकारी कागजों में नल जल योजना के सफल होने का मतलब यही है कि ग्रामीण अपना घर छोड़कर पलायन करने को मजबूर हो जाएं। धमतरी प्रशासन को अब इस मामले को महज एक सरकारी रिपोर्ट न समझकर इसे मानवीय संवेदना के नजरिए से देखना होगा। अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले दिनों में रामपुर सिर्फ एक नक्शे का नाम रह जाएगा। वहां कोई आबादी नहीं बचेगी।
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