अनिल मालवीय, इछावर। मध्य प्रदेश के इछावर विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले ग्रामीण इलाकों में गर्मियां शुरू होते ही पानी के लिए त्राहि-त्राहि मच जाती है। जलसंकट की सबसे भयावह और हैरान करने वाली तस्वीर ब्रिजीशनगर गांव से सामने आई है। जहां रोजमर्रा की जरूरत को पूरा करने पानी के लिए ग्रामीणों को हर दिन एक जंग लड़नी पड़ रही है। आलम यह है कि पानी खींचने के लिए एक ही सरकारी कुएं में जर्जनों पाइप और मोटर डाल दी गई है, जिससे सरकारी स्कूल में प्लास्टिक पाइपों का मकड़जाल खड़ा हो गया है।

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कुएं पर रातभर पहरा, 150 लीटर पानी के लिए होड़

8 हजार की आबादी वाले ब्रिजीशनगर में जलसंकट इस कदर गहरा गया है कि गांव के सरकारी हायर सेकंड्री स्कूल परिसर में बने एकमात्र कुएं में 50 से अधिक प्लास्टिक पाइप और सिंगल फेस मोटर लटकी हुई दिखाई दे रही है। स्कूल बिल्डिंग पर चारों तरफ फैले ये पाइप गांव की बेबसी बयां कर रहे हैं।

रात भर कुएं के इर्द-गिर्द चक्कर काट रहे ग्रामीण

ग्रामीणों ने बताया कि बिजली कटौती होने पर या रात के समय कुएं में जो भी थोड़ा-बहुत पानी रिसकर इकट्ठा होता है, उसे खींचने के लिए लोगों में होड़ मच जाती है। मात्र 150 से 200 लीटर पानी हासिल करने के लिए लोग रात-रात भर कुएं के इर्द-गिर्द चक्कर काटते हैं और अपनी बारी का इंतजार करते हैं।

लाखों की ‘नल-जल योजना’ हुई फेल

गांव में पीने के पानी की आपूर्ति के लिए लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (PHE) द्वारा करीब 5 साल पहले लाखों रुपए की लागत से ‘नल-जल योजना’ शुरू की गई थी। इसके तहत गांव में चार ट्यूबवेल खोदे गए, पानी की टंकी बनाई गई और घर-घर पाइप लाइन भी बिछाई गई। लेकिन आज यह पूरी योजना कागजों तक ही सीमित रह गई है।

घरों में कनेक्शन लेकिन नलों में पानी नहीं

घरों में नल कनेक्शन तो हैं लेकिन पानी हफ्ते में सिर्फ एक या दो दिन ही आता है। वह भी महज 10 से 15 मिनट के लिए। इतनी कम समय की सप्लाई 8 हजार की आबादी की प्यास बुझाने के लिए बिल्कुल नाकाफी है। निजी टैंकर संचालक पानी के लिए मोटी रकम वसूल रहे हैं, जिससे गरीब परिवारों के लिए टैंकर से पानी मंगवाना मुमकिन नहीं है।

सभी हैंडपंप सूखे, गिर रहा है वाटर लेवल – सरपंच

मामले को लेकर गांव के सरपंच शिवप्रसाद ने बताया कि गांव के सभी हैंडपंप पूरी तरह सूख चुके हैं। जो 4 सरकारी ट्यूबवेल खनन किए गए थे उनमें से 3 का पानी खत्म हो चुका है। फिलहाल पड़ोसी गांव फांगिया के पास स्थित ट्यूबवेल से जैसे-तैसे सप्लाई की जा रही है। लेकिन वाटर लेवल लगातार गिरने के कारण वह भी कुछ ही घंटे चल पाती है।

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युवाओं ने बचपन से सिर्फ ‘जलसंकट’ ही देखा

गांव के 30-35 वर्षीय युवा सतीश राठौर का कहना है कि उन्होंने जब से होश संभाला है, गांव को पानी के लिए तरसते ही देखा है। यानी पिछले तीन दशकों (30 साल) में इस गांव की तकदीर में पानी को लेकर कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है। ग्रामीणों में इस बात को लेकर भारी आक्रोश है कि हर चुनाव में प्रत्याशी आते हैं और जलसंकट का स्थाई समाधान करने का बड़ा-बड़ा वादा करते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही परेशानी फिर जस की तस हो जाती है। प्रशासन की इस बेरुखी से ग्रामीणों का सब्र अब जवाब दे रहा है।

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