राजधानी के विवेक विहार इलाके में हुए दिल दहला देने वाले अग्निकांड ने पूरे शहर को झकझोर कर रख दिया। इस हादसे में एक ही परिवार की तीन पीढ़ियों के पांच लोगों की दर्दनाक मौत हो गई। मृतकों में 62 वर्षीय अरविंद जैन, उनकी पत्नी अनीता जैन, 34 वर्षीय बेटा निशांक जैन, बहू आंचल जैन और डेढ़ वर्षीय पोता अक्षय शामिल हैं। आग इतनी भीषण थी कि परिवार को संभलने का मौका तक नहीं मिला। इस त्रासदी से ठीक कुछ घंटे पहले ही परिवार खुशी के माहौल में था। शनिवार रात करीब 12 बजे सभी ने वीडियो कॉल के जरिए एक बच्चे का जन्मदिन मनाया, केक काटा और शुभकामनाएं दीं। रविवार को मानेसर में बड़े स्तर पर जन्मदिन समारोह की तैयारी थी।
बताया जा रहा है कि हादसे से पांच दिन पहले ही परिवार में एक छोटा पारिवारिक समारोह हुआ था, जिसमें सभी सदस्य और रिश्तेदार शामिल हुए थे। लेकिन खुशियों का यह माहौल कुछ ही घंटों में मातम में बदल गया। रविवार तड़के करीब साढ़े तीन घंटे बाद अचानक लगी आग ने पूरे घर को अपनी चपेट में ले लिया, जिससे किसी को बचने का मौका नहीं मिला। जिस इमारत में यह हादसा हुआ, वहां सुरक्षा और सुविधा के पुख्ता इंतजाम किए गए थे, लेकिन वही इंतजाम हादसे के दौरान नौ लोगों की जान पर भारी पड़ गए। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, इमारत में सुरक्षा के लिहाज से ग्रिल, मजबूत दरवाजे और बंद ढांचा बनाया गया था, ताकि बाहरी खतरे से बचाव हो सके। लेकिन आग लगने के बाद यही बंद व्यवस्था निकास (एग्जिट) के रास्ते में बाधा बन गई। धुएं और आग के तेजी से फैलने के बीच लोगों को बाहर निकलने का मौका नहीं मिल पाया। जिन सुरक्षा उपायों को सुरक्षित रहने के लिए लगाया गया था, वही आपात स्थिति में ‘ट्रैप’ बन गए।
सिर्फ एक ही सीढ़ी और लिफ्ट
जानकारी के मुताबिक, आठ फ्लैट्स में रह रहे आठ परिवारों के लिए नीचे आने का केवल एक ही रास्ता था करीब 1.5 मीटर चौड़ी एक संकरी सीढ़ी और एक लिफ्ट। ऐसे में आग लगने की स्थिति में सभी लोगों का एक साथ बाहर निकल पाना लगभग असंभव हो गया। स्थिति और गंभीर तब हो गई जब सीढ़ियों पर लगे टफन (टफेंड) ग्लास ने आग के दौरान तापमान को तेजी से बढ़ा दिया। तेज गर्मी के कारण ये ग्लास टूट गए, जिससे सीढ़ियों से सुरक्षित निकलना और भी मुश्किल हो गया। इमारत के पीछे और दाहिने हिस्से में लोहे की मोटी ग्रिल का जाल लगाया गया था, ताकि बंदर और कबूतर अंदर न आ सकें। लेकिन यही ग्रिल आपात स्थिति में ‘जाल’ बन गई। ग्रिल के कारण इमारत के किनारों से रास्ता पूरी तरह बंद हो गया ,दाहिनी ओर तो दो इमारतों के बीच जरूरी खाली जगह भी नहीं बची ,दमकलकर्मी साइड से अंदर प्रवेश नहीं कर पाए ,पीछे की ओर से ग्रिल काटने में काफी समय लग गया इन सभी कारणों ने मिलकर राहत और बचाव कार्य को गंभीर रूप से प्रभावित किया, जिससे नुकसान और बढ़ गया।
छत का पहले से लॉक दरवाजा
हादसे के वक्त छत तक जाने वाली सीढ़ियों के दरवाजे पर ताला लगा हुआ था, जिसके चलते एक पूरा परिवार ऊपर छत की ओर भागकर अपनी जान नहीं बचा सका। आपात स्थिति में छत अक्सर एक सुरक्षित विकल्प मानी जाती है, लेकिन यहां यह रास्ता पूरी तरह बंद था। इसके अलावा, इमारत के अधिकांश फ्लैट्स में लगे डिजिटल लॉक भी जानलेवा साबित हुए। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, एसी में धमाके के बाद हुए शॉर्ट सर्किट के कारण ये डिजिटल लॉक जाम हो गए, जिससे लोग अपने कमरों से बाहर नहीं निकल सके।
निशांक फोन कर भाई और अन्य मदद मांगते रहे
हादसे के दौरान निशांक जैन ने मदद के लिए कई लोगों को फोन किए, लेकिन किस्मत ने साथ नहीं दिया। परिवार के करीबी और अरविंद जैन के मित्र मनोज जैन ने बताया कि उनकी रात करीब 2 बजे अरविंद जैन से बातचीत हुई थी। इसके बाद वह करीब ढाई बजे सो गए। सुबह जब उनकी नींद खुली तो उन्होंने फोन चेक किया, जिसमें निशांक के दो मिस्ड कॉल दिखे एक सुबह 3:50 बजे दूसरा करीब 4 बजे उन्होंने बताया कि फोन साइलेंट मोड पर था, इसलिए कॉल का पता नहीं चल सका।“मुझे जिंदगी भर इस बात का अफसोस रहेगा कि मैं फोन नहीं उठा पाया,” यह घटना उस बेबसी को दर्शाती है, जब लोग मदद के लिए आखिरी कोशिश करते हैं, लेकिन हालात और समय उनके खिलाफ खड़े हो जाते हैं।
यूपी पुलिस को 20 मिनट तक लगता रहा फोन
हादसे के दौरान आपातकालीन कॉल सही एजेंसियों तक समय पर नहीं पहुंच पाई, जिससे राहत और बचाव कार्य में देरी हुई। स्थानीय लोगों के मुताबिक, आग लगते ही उन्होंने तुरंत पुलिस और दमकल विभाग को फोन कर सूचना देने की कोशिश की, लेकिन बार-बार कॉल उत्तर प्रदेश पुलिस के कंट्रोल रूम में लगती रही। इस वजह से घटना की जानकारी संबंधित एजेंसियों तक पहुंचाने में करीब 20 मिनट की देरी हो गई। आपात स्थिति में यह देरी बेहद अहम साबित होती है, क्योंकि आग जैसी घटनाओं में हर मिनट कीमती होता है। शुरुआती समय में यदि दमकल और बचाव दल मौके पर पहुंच जाते, तो नुकसान को कम किया जा सकता था।
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