संजय वाणी, आलीराजपुर। मध्य प्रदेश में भीषण गर्मी के बीच ग्रामीण इलाकों से पानी के संकट की दर्दनाक तस्वीरें लगातार सामने आ रही हैं। विकास के बड़े-बड़े दावों और ‘हर घर जल’ जैसी योजनाओं के बीच आलीराजपुर जिले के उदयगढ़ जनपद क्षेत्र से एक ऐसी जमीनी हकीकत सामने आई है जो जिम्मेदार प्रशासनिक व्यवस्था को पूरी तरह कटघरे में खड़ा करती है। यहां के खारिया फलिया में पिछले कई वर्षों से आदिवासी परिवार बूंद-बूंद पानी के लिए अपनी जान जोखिम में डाल रहे हैं।

12 फीट गहरे नाले के गड्ढे में उतरकर निकल रहा ‘जीवन’

खारिया फलिया के करीब 20 आदिवासी परिवारों की जिंदगी इन दिनों रुचकी नाले में बने एक 12 फीट गहरे झिरीनुमा गड्ढे के भरोसे चल रही है। यही नाला और गड्ढा इन ग्रामीणों का कुआं है और प्यास बुझाने का एकमात्र सहारा भी।

सुबह होते ही महिलाओं के सिर पर मटके और हाथों में बर्तन दिखाई देने लगते हैं। गांव से एक किलोमीटर से अधिक की दूरी तय कर वे इस नाले तक पहुंचती हैं। इसके बाद गड्ढे में एक सीढ़ी उतारी जाती है, जिसके सहारे एक महिला नीचे उतरती है और ऊपर खड़े लोग बर्तनों को संभालते हैं। तब जाकर कहीं पानी नसीब होता है। यह कोई एक दिन की बात नहीं, बल्कि इन ग्रामीणों का रोज का खौफनाक सच है।

गंदा और खारा पानी पीने को मजबूर ग्रामीण

ग्राम पंचायत आम्बी के ग्राम छारवी स्थित खारिया फलिया और ग्राम पंचायत थांदला के उमेरी गांव की सीमा पर बसे इन परिवारों के सामने पानी का विकराल रूप है। ग्रामीणों के अनुसार फलिये में लगे हैंडपंप या तो पूरी तरह सूख चुके हैं या फिर उनसे निकलने वाला पानी इतना खारा है कि उसे पिया नहीं जा सकता। नतीजा यह है कि इस तपती गर्मी में लोग नाले के गंदे पानी को ही पीने, खाना बनाने और रोजमर्रा की जरूरतों के लिए इस्तेमाल करने को मजबूर हैं।

फाइलों में कुआं पास, जमीन पर अधूरा निर्माण और भ्रष्टाचार का आरोप

ग्रामीणों के इस संकट को दूर करने के लिए वर्ष 2024 में जनपद पंचायत उदयगढ़ ने मनरेगा योजना के तहत एक सार्वजनिक कुएं की स्वीकृति दी थी। लेकिन भ्रष्टाचार और लचर प्लानिंग की वजह से यह योजना भी फाइलों में ही बह गई।

ग्रामीणों का आरोप है कि कुएं का निर्माण उस स्थान पर कराया ही नहीं गया, जहां इसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी। खारिया फलिया से दूर ग्राम झीरी की सीमा में अधूरा निर्माण कराकर छोड़ दिया गया। ग्रामीणों ने सीधा आरोप लगाया है कि काम पूरा किए बिना ही पूरी राशि निकाल ली गई। यदि यह कुआं समय पर और सही जगह बनता तो आज महिलाओं को इस तरह जान जोखिम में नहीं डालनी पड़ती।

दो पंचायतों के बीच फंसी प्यास, सिर्फ आश्वासन मिले पानी नहीं

खारिया फलिया की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यहां रहने वाले परिवार दो अलग-अलग पंचायतों के फेर में फंसे हैं। इनके मकान ग्राम पंचायत आम्बी की सीमा में आते हैं, जबकि खेती की जमीन ग्राम पंचायत थांदला के उमेरी गांव में है। ग्रामीणों का कहना है कि इसी सीमा विवाद की वजह से दोनों पंचायतें एक-दूसरे पर बात टालती रहती हैं और समस्या जस की तस बनी हुई है। ग्रामीणों ने कई बार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से गुहार लगाई लेकिन हर बार उन्हें टैंकरों से जलापूर्ति के खोखले आश्वासन ही मिले।

क्या व्यवस्था किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रही है?

सीढ़ी के सहारे 12 फीट गहरे गड्ढे में उतरती महिलाओं की तस्वीरें सिर्फ पानी भरने की मजबूरी नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र की विफलता को उजागर करती हैं। जब कागजों में हर योजना सफल है, तो जमीन पर ये आदिवासी परिवार इस नरकीय जीवन को जीने के लिए क्यों मजबूर हैं? सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रशासन खारिया फलिया की प्यास बुझाने के लिए किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है?

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