प्रमोद निर्मल, मोहला-मानपुर। केंद्र सरकार ने महत्वाकांक्षी योजना राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार मिशन शुरू की थी ताकि महिलाएं और महिला समूहें योजना से लाभान्वित होकर आर्थिक आत्मनिर्भर बन सके, लेकिन विडंबना ही कहें कि मोहला-मानपुर जिले में NRLM विभाग के गैर जिम्मेदाराना रवैये और जिला प्रशासन की बेपरवाही ने स्व रोजगार के वरदान के तौर पर शासन द्वारा धरातल में उतारी गई ये योजना आदिवासी बाहुल्य इलाके के महिलाओं के लिए अभिशाप बन गई है। कांग्रेस सरकार में जिस गोबर का बोलबाला था सत्ता परिवर्तन के बाद आज यही गोबर महिलाओं के लिए मुसीबत बन गई है और उनका समूह कर्ज में डूब गया है।
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दरअसल, मानपुर विकासखंड अंतर्गत औंधी तहसील क्षेत्र के ग्राम सरखेड़ा में संचालित पदम महिला स्व सहायता समूह की महिलाएं NRLM के तहत प्रशासनिक अफसरों के भरोसे गोबर पेंट का रोजगार अपना कर लाखों रुपए के कर्ज में डूब गई हैं। समूह की महिलाओं की माने तो प्रशासनिक अफसरों ने उन्हें गोबर पेंट का रोजगार शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया और उन्होंने ये भरोसा भी दिलाया कि बनाए गए गोबर पेंट को बिकवाने में वे समूह की मदद करेंगे। यही नहीं शासकीय दफ्तरों में भी उपयोग किए समूह से गोबर पेंट की खरीदी होगी।

धूल फांकते पड़ी है पेंट की खेप
महिलाओं के मुताबिक, अफसरों के इस भरोसे को आधार बनाकर उन्होंने शासन द्वारा सरखेड़ा गांव में स्थापित रीपा यानी रूरल इंडस्ट्रियल पार्क परिसर में यहां लगे पेंट निर्माण संयंत्रों के जरिए भारी मात्रा में गोबर को फिल्टर कर उससे प्राकृतिक पेंट का बनाया। महिलाओं की मानें तो बैंक से लाखों रुपए लोन लेकर समूह ने करीब 12 लाख रुपए की लागत का गोबर पेंट बनाया, मार्केट से डिब्बे खरीदकर पेंट का पैक तैयार किया गया, लेकिन अब बिक्री न होने के चलते पेंट की खेप रीपा केंद्र में धूल फांकते पड़ी है।

शुरुआती दौर में करीब 3 लाख 50 हजार रुपए का पेंट बिका जरूर लेकिन अब तक केवल 50 हजार रुपए ही भुकतान ही उन्हें मिल सका है। महिलाओं के मुताबिक एक तरफ तीन लाख रुपए का भुगतान अटका है, पेंट की बिक्री न होने से वे बैंक के कर्ज में डूब गईं हैं। वहीं दूसरी ओर जिन अफसरों के भरोसे उन्होंने पेंट का रोजगार अपनाया वो अब महिलाओं और उनके रोजगार की दुर्दशा को झांकने तक नहीं आते। इस तरह से जिला प्रशासन और NRLM के जिम्मेदारों की उदासीनता से सरकार की रोजगार मूलक महात्वाकांक्षी योजना का बेड़ागर्क हो गया है और पेंट के रोजगार से आर्थिक उन्नति करने के बजाय समूह की महिलाएं बैंक की कर्जदार बन गई हैं।

इधर जिला पंचायत की सी ई ओ अब महिलाओं को यथासंभव मदद का भरोसा दिला रहीं है, लेकिन प्रशासन की पिछली गैरजिम्मेदाराना करतूत ये सोचने पर मजबूर कर रही है कि क्या प्रशासनिक कारिंदे इस बार अपने दिलाए भरोसे पर खरा उतरेंगे या ये ग्रामीण महिलाएं फिर से प्रशासनिक छलावे का शिकार बन पेंट खरीददार की आस में कर्ज तले आंसू बहाते ही रह जाएंगी।
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