चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में अडल्ट्री (व्यभिचार) के आरोप को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पत्नी का शादी के बाद अपने पूर्व प्रेमी से एक बार मिलना, यहां तक कि उसे कथित तौर पर आपत्तिजनक स्थिति में पाया जाना भी अपने-आप में यह साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि वह लगातार अडल्ट्री में रह रही थी।

एडवोकेट Hans Chanda द्वारा साझा की गई फैसले की जानकारी के मुताबिक, मामले में पति ने आरोप लगाया था कि उसकी पत्नी के शादी से पहले एक व्यक्ति के साथ संबंध थे और विवाह के बाद भी वह उसके संपर्क में थी। पति ने इस आरोप को वैवाहिक विवाद और तलाक की कार्यवाही में अहम आधार बनाया था।

मामले में 11 जनवरी 2023 की एक घटना का भी उल्लेख सामने आया। पति का दावा था कि उसने उस दिन अपनी पत्नी को उसके पूर्व प्रेमी के साथ कथित आपत्तिजनक अवस्था में देखा था। पति ने इस घटना को पत्नी के अडल्ट्री में लिप्त होने के प्रमाण के तौर पर पेश किया।

हालांकि, हाईकोर्ट ने इस एक घटना के आधार पर यह निष्कर्ष निकालने से इनकार किया कि पत्नी लगातार उस व्यक्ति के साथ ‘लिविंग इन अडल्ट्री’ में रह रही थी। अदालत के अनुसार, किसी व्यक्ति के खिलाफ अडल्ट्री का निष्कर्ष निकालने के लिए केवल एक अलग-थलग घटना को पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता। मामले में उपलब्ध पूरे साक्ष्य और परिस्थितियों को देखना जरूरी है।

अदालत ने शादी से पहले के कथित प्रेम संबंध को लेकर भी अहम बात कही। केवल यह तथ्य कि पत्नी का विवाह से पहले किसी व्यक्ति के साथ संबंध था, अपने आप में विवाह के बाद अडल्ट्री का प्रमाण नहीं बन जाता। शादी के बाद के आचरण को साबित करने के लिए अलग और ठोस परिस्थितियों पर विचार करना जरूरी है।

इस फैसले का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि हाईकोर्ट ने पति को मिला तलाक पूरी तरह खत्म नहीं किया। अदालत ने वैवाहिक रिश्ते में सामने आए अन्य तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए मानसिक क्रूरता के आधार पर तलाक के फैसले को बरकरार रखा।

यानी अदालत के फैसले में अडल्ट्री और मानसिक क्रूरता को अलग-अलग आधार के रूप में देखा गया। पत्नी के खिलाफ अडल्ट्री का आरोप केवल एक घटना और पुराने रिश्ते के आधार पर पर्याप्त साबित नहीं हुआ, लेकिन वैवाहिक विवाद से जुड़े अन्य तथ्यों के आधार पर मानसिक क्रूरता का निष्कर्ष तलाक को बरकरार रखने के लिए पर्याप्त माना गया।

सरल शब्दों में समझें तो हाईकोर्ट की टिप्पणी का मतलब यह है कि एक बार पूर्व प्रेमी से मिलना अपने-आप अडल्ट्री साबित नहीं करता। कथित आपत्तिजनक स्थिति में पाया जाना भी अकेले ‘लिविंग इन अडल्ट्री’ का निर्णायक प्रमाण नहीं है। वहीं, शादी से पहले का रिश्ता भी शादी के बाद व्यभिचार का स्वतः प्रमाण नहीं बन सकता।

एडवोकेट Hans Chanda के अनुसार साझा की गई जानकारी में इस मामले को 2026 LiveLaw (PH) 176 के रूप में रिपोर्ट किया गया है। फैसले में अदालत ने परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अडल्ट्री के आरोप तथा मानसिक क्रूरता के आधार पर तलाक के पहलू को अलग-अलग परखा.