सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक याचिका ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है. दाखिल याचिका में खास तौर पर 2019 के एक्ट की धारा 2(के) के तहत ट्रांसजेंडर व्यक्ति की परिभाषा में किए गए बदलाव को चुनौती दी गई है. शीर्ष अदालत में दाखिल इस याचिका में कहा गया हैं कि केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में कानून में किए संशोधनों से ट्रांसजेंडर व्यक्तियों का अपने लिंग का स्वयं निर्धारण करने का मौलिक अधिकार छीन लिया गया है.
सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है जो ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देती है।
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक याचिका ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है. राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर व्यक्ति परिषद के अध्यक्ष लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी और सदस्य जैनब पटेल ने संविधान के अनुच्छेद-32 के तहत सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है. याचिका में कहा गया कि केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में कानून में किए संशोधनों से ट्रांसजेंडर व्यक्तियों का अपने लिंग का स्वयं निर्धारण करने का मौलिक अधिकार छीन लिया गया है.
याचिकाकर्ता त्रिपाठी किन्नर अखाड़े की आचार्य महामंडलेश्वर, भरतनाट्यम नृत्यांगना, लेखिका, सामाजिक कार्यकर्ता और अस्तित्व ट्रस्ट की संस्थापक हैं, वहीं दूसरी याचिकाकर्ता पटेल केपीएमजी इंडिया में निदेशक (समावेशन और विविधता) और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए राष्ट्रीय परिषद (पश्चिमी क्षेत्र) की सदस्य हैं. याचिका में कानून में सरकार द्वारा किए संशोधन पर सवाल उठाते हुए कहा गया कि संशोधित कानून ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को गारंटीकृत मौलिक अधिकारों को अपूरणीय संवैधानिक क्षति पहुंचाता है.

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में खास तौर पर 2019 के एक्ट की धारा 2(के) के तहत ट्रांसजेंडर व्यक्ति की परिभाषा में किए गए बदलाव को चुनौती दी गई है. इसमें कहा गया कि जहां पहले की परिभाषा में लैंगिक पहचान को व्यक्ति के अपने अनुभव पर आधारित माना जाता था, वहीं संशोधित प्रावधान में इस आधार को हटाकर उसकी जगह सामाजिक-सांस्कृतिक पहचानों और चिकित्सकीय रूप से जांची जा सकने वाली जैविक स्थितियों की एक सूची रख दिया गया है.
वहीं इस नए कानून की विपक्षी पार्टियों और LGBTQIA+ समूहों ने आलोचना की है. संबंधित पक्षों ने यह तर्क दिया है कि संसद में बिल पेश किए जाने से पहले उनसे बिल्कुल भी सलाह-मशविरा नहीं किया गया था. नेशनल काउंसिल ऑफ ट्रांसजेंडर पर्सन्स (NCTP) के दो सदस्यों, कल्कि सुब्रमण्यम और रितुपर्णा नियोग ने, जिस दिन राज्यसभा ने इस बिल को पास किया, उसी दिन अपने पदों से इस्तीफ़ा दे दिया.
ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए राष्ट्रीय परिषद (एनसीटीपी) के कार्यकर्ताओं और सदस्यों ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की है, जिसमें उनका मुख्य तर्क यह है कि यह मौलिक अधिकारों पर “अपरिवर्तनीय संवैधानिक क्षति” पहुंचाता है।
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